Monday , 19 February 2018
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कबीरवाणीः प्रभु नाम का स्मरण के लिए समय नहीं, भाव चाहिए

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एक बार संत कबीर से किसे ने पूछा, आप दिनभर कपड़ा बुनते हैं तो भगवान का स्मरण कब करते हैं? कबीर उसे लेकर झोपड़ी से बाहर आ गए और कहा कि यहां खड़े रहो।

तुम्हारे सवाल का जबाव शायद में न दे सकूं, लेकिन उसे दिखा सकता हूं। कबीर ने दिखाया कि एक औरत पानी की गागर सिर पर रखकर लौट रही थी। उसके चेहरे पर प्रसन्नता थी। गागर को उसने बिल्कुल छोड़ रखा था।

फिर भी वह पूरी तरह संभली हुई थी। कबीर ने कहा- इस औरत को देखो। वह कोई गीत गुनगुना रही है। शायद कोई प्रियजन घर आया होगा। वह प्यासा होगा, उसके लिए पानी लेकर जा रही है। मैं तुमसे जानना चाहता हूं कि उसे गागर की यदा होगी या नहीं।

उस आदमी ने कहा- याद नहीं होती तो शायद गागर अभी तक रिस से गिर चुकी होती। कबीर बोले, यह साधारण सी औरत रास्ता पार करती है, गीत गाती है, फिर भी गागर का ध्यान रखती है।

ठीक इसी तरह में प्रभु का स्मरण करता हूं। कपड़ा बुनने के काम में शरीर लगा रहता है और मेरा ध्यान ईश्वर की ओर रहता है।

In English

Who once asked saint Kabir, if you weave cloth all day, then when do you remember God? Kabir came out of the cottage with him and said that stand here.

Maybe I can not answer the question, but I can show it. Kabir showed that a woman was returning after putting the water garger on her head. There was happiness on his face. He had left the gaagar up completely.

Yet he was fully convinced. Kabir said – look at this woman. He is lukewarming a song. Maybe a loved one would have come home. He will be thirsty, taking water for him. I want to know from you whether he will be in the gaagar or not.

The man said- If he did not remember then perhaps the gaagar would have fallen away from the ruse. Kabir said, this simple woman crosses the path, sings the song, still carries the attention of the gaagar.

In this way, I remember the Lord. The body is engaged in the work of knit fabric and my focus is towards God.

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