Saturday , 24 February 2018
Latest Happenings
Home » Do you Know? » कला का ज्ञान और फिर अभिमान

कला का ज्ञान और फिर अभिमान

%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B0-%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8

%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B0-%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8

एक युवा ब्रह्यचारी ने दुनिया के कई देशों में जाकर अनेक कलाएं सीखीं। एक देश में उसने धनुष बाण बनाने और चलाने की कला सीखी और कुछ दिनों के बाद वह दूसरे देश की यात्रा पर गया।
वहां उसने जहाज बनाने की कला सीखी क्योंकि वहां जहाज बनाए जाते थे। फिर वह किसी तीसरे देश में गया और कई ऐसे लोगों के संपर्क में आया, जो घर बनाने का काम करते थे।
इस प्रकार वह सोलह देशों में गया और कई कलाओं को अर्जित करके लौटा। अपने घर वापस आकर वह अहंकार में भरकर लोगों से पूछा- ‘इस संपूर्ण पृथ्वी पर मुझ जैसा कोई गुणी व्यक्ति है ?’
लोग हैरत से उसे देखते। धीरे-धीरे यह बात भगवान बुद्ध तक भी पहुंची। बुद्ध उसे जानते थे। वह उसकी प्रतिभा से भी परिचित थे। वह इस बात से चिंतित हो गए कि कहीं उसका अभिमान उसका नाश न कर दे। एक दिन वे एक भिखारी का रूप धरकर हाथ में भिक्षापात्र लिए उसके सामने गए।
ब्रह्यचारी ने बड़े अभिमान से पूछा- कौन हो तुम ? बुद्ध बोले- मैं आत्मविजय का पथिक हूं। ब्रह्यचारी ने उनके कहे शब्दों का अर्थ जानना चाहा तो वे बोले- एक मामूली हथियार निर्माता भी बाण बना लेता है, नौ चालक जहाज पर नियंत्रण रख लेता है, गृह निर्माता घर भी बना लेता है।
केवल ज्ञान से ही कुछ नहीं होने वाला है, असल उपलब्धि है निर्मल मन। अगर मन पवित्र नहीं हुआ तो सारा ज्ञान व्यर्थ है। अहंकार से मुक्त व्यक्ति ही ईश्वर को पा सकता है। यह सुनकर ब्रह्यचारी को अपनी भूल का अहसास हो गया।

In English

A young Brahmachari has learned many arts in many countries of the world. In one country, he learned the art of making and running bow arrows and after a few days he went on a journey to another country.
There he learned the art of making the ship because the ships were built there. Then he went to a third country and came in contact with many people who used to build houses.
Thus he went to sixteen countries and returned after earning many arts. Coming back to his house he filled the ego and asked the people – ‘Is there a virtuous person like me on this whole earth?’
People are surprised to see him Gradually, this point reached Lord Buddha. Buddha knew him. He was also familiar with his talent. He became worried that his pride would not destroy him. One day he took the form of a beggar and went in front of him for a beggar.
Brahchayari asked with great pride – who are you? Buddha said – I am the path of self-interest. If he wanted to know the meaning of his words, he said, – A slight weapon maker also makes arrows, nine drivers control the ship, the home builder also makes the house.
Nothing is going to happen only through knowledge, the real achievement is the pure mind If the mind is not pure then all knowledge is in vain. A person free of ego can find God. By hearing this, the Brahvikari realized his mistake.

Comments

comments