Monday , 23 October 2017
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बचपन से ही थे गुरु नानक जी विद्वान, शिक्षक थे हैरान

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पंजाब का एक छोटा सा शहर तलवंडी में कालूराय बेदी की पत्नी तृप्ता देवी के गर्भ से एक शिशु का जन्म हुआ। यह शिशु बालक था, जिसने बड़े होकर अपना समूचा जीवन धार्मिक कट्टरता और धर्म के नाम पर होने वाले अत्याचारों और अनाचारों का विनाश करने के लिए समर्पित कर दिया।कालूराय बेदी तलवंडी के शासक राय दुलार के प्रधान पटवारी थे। साथ ही अत्यधिक विश्वासपात्र भी। उनका घर धन-धान्य से भरा हुआ था। इसलिए शिशु का जन्मोत्सव बहुत धूम-धाम से मनाया गया।तृप्ता देवी ने पुत्री नानकी के जन्म के बाद एक पुत्र को जन्म दिया था। पुत्री का नाम नानकी इसलिए रखा गया क्यों कि उसका अधिक समय ननिहाल में ही गुजरा था। इसलिए बालक को बहिन के नाम का पर्याय देते हुए नानक के रूप में बुलाया जाने लगा।

बचपन से ही नानक में विलक्षण प्रतिभाएं देखने के मिलने लगीं थीं। वह किसी भी पेड़ के नीचे बैठकर ‘सत करतार’ का जप किया करते थे। पांच वर्ष की उम्र में ही उनकी पढ़ाई शुरु हो गई।

उनके पहले गुरु बने पंडित गोपाल के पास जाने लगे। वह इतने कुशाग्र बुद्धि के थे कि कुछ दिनों में ही पं. गोपाल मान गए कि वह जितने पढ़े लिखे हैं उससे कहीं अधिक ज्ञान नानक जी को है।इसके बाद नानक जी की फारसी शिक्षा शुरू हुई। उनको फारसी की शिक्षा देने के लिए मौलवी कुतबुद्वीन के पास भेज दिया गया।

लेकिन मौलवी ने कुछ दिनों बाद कालूराय जी को बताया कि यह बालक फारसी का विद्वान है। नानक की योग्यता देखकर उनके दोनों गुरु ही हैरान थे।

Hindi to English

In the small town of Talwandi, a baby was born from the womb of the wife of Kalurai Bedi,Trupta Devi. This infant was a child, who, after growing up, devoted all his life to destruction of atrocities and incidents of religious fanaticism and religion.

Kalurai Bedi was the patwari of Rai Dular, ruler of Talwandi. Plus, too confidant. His house was full of grains. Therefore, the birth anniversary of the infant was celebrated with great enthusiasm.

Tripta Devi gave birth to a son after the birth of daughter Nanaki. Nunki was named after daughter because she had spent more time in Nanihal. Hence, the child was called as Nanak, giving the option of the name of his sister.

From childhood, Nanak started to see the unique talents. He used to chant ‘Sat kartar’ sitting under any tree. At the age of five, his studies started.

They started going to Pandit Gopal, who became their first guru. He was so intelligent that within a few days, Pundal agreed that Nanak had more knowledge than he had written.

After this, Persian education of Nanak started. He was sent to Maulvi Kutubuddin to teach Persian.

But after some days Maulvi told Kalurai that this child is a scholar of Persian. Seeing the merit of Nanak, both of his Gurus were surprised.

 

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