Thursday , 13 July 2017
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दोस्ती का एक अनोखा अंदाज

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दोस्ती का एक अनोखा अंदाज

                                                                           दोस्ती का एक अनोखा अंदाज

डॉ. जाकिर हुसैन जब विशेष अध्ययन के लिए जर्मनी गए हुए थे। वहां कोई भी अनजान व्यक्ति दूसरे अनजान को देखकर अपना नाम बताते हुए हाथ आगे बढ़ा देता था। इस प्रकार अपरिचित लोग भी एक दूसरे के दोस्त बन जाते थे। दोस्ती करने का यह रिवाज वहां काफी लोकप्रिय था।

एक दिन जाकिर हुसैन कॉलेज में वार्षिकोत्सव मनाया जा रहा था। कार्यक्रम का समय हो चुका था। सभी विद्यार्थी व शिक्षक वार्षिकोत्सव के लिए निर्धारित स्थल पर पहुंच रहे थे। जाकिर साहब भी जल्दी-जल्दी वहां जाने के लिए अपने कदम बढ़ा रहे थे। जैसे ही उन्होंने कॉलेज में प्रवेश किया, एक शिक्षक महोदय भी वहां पहुंचे। दोनों ही जल्दबाजी और अनजाने में एक-दूसरे से टकरा गए।

शिक्षक महोदय जाकिर साहब से टक्कर होने पर गुस्से से उन्हें देखते हुए बोले, ‘इडियट।’ यह सुनकर जाकिर साहब ने फौरन अपना हाथ आगे की ओर बढ़ाया और बोले, ‘जाकिर हुसैन। भारत से यहां पढ़ने के लिए आया हुआ हूं।’

जाकिर साहब की हाजिरजवाबी देखकर शिक्षक महोदय का गुस्सा मुस्कराहट में बदल गया। वह बोले, ‘बहुत खूब। आपकी हाजिरजवाबी ने मुझे प्रभावित कर दिया। इस तरह परिचय देकर आपने हमारे देश के रिवाज को भी मान दिया है और साथ ही मुझे मेरी गलती का अहसास भी करा दिया है।

वाकई हम अनजाने में एक-दूसरे से टकराए थे। ऐसे में मुझे क्षमा मांगनी चाहिए थी। अपशब्द नहीं बोलने चाहिए थे।’

In English

When Dr. Zakir Hussain went to Germany for a special study. There was no unaware person looking at the other unknown and giving out his name and handing it forward. Thus unfamiliar people would also become friends of each other. This custom of friendship was very popular there.

One day the annual festival was being celebrated at Zakir Hussain College. The time for the program was over. All students and teachers were reaching the venue for the annual festival. Zakir Sahib was also taking his steps to get there quickly. As soon as he entered college, a teacher arrived there too. Both hurried and collided with each other unknowingly.

When the teacher jumped in front of Jakir Sahib, looking at him with anger, ‘Idiot.’ Upon hearing this, Zakir Sahib immediately turned his hand forward and said, ‘Zakir Hussain. I have come here to study from India. ‘

Seeing the presence of Zakir Sahib, the anger of the teacher turned into a grin. He said, ‘Great enough. Your impression impressed me. By introducing this way, you have acknowledged the custom of our country and also made me realize my mistake.

Indeed, we were unknowingly colliding with each other. In such a way, I should have apologized. They should not have spoken abusively. ‘

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