Tuesday , 19 September 2017
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ब्राह्मण के आंसुओं में बह गया अर्जुन का अभिमान

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एक दिन श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने साथ घुमाने ले गए। रास्ते में उनकी भेंट एक निर्धन ब्राह्मण से हुई। उसका व्यवहार थोड़ा विचित्र था।

वह सूखी घास खा रहा था और उसकी कमर से तलवार लटक रही थी। अर्जुन ने उससे पूछा- ‘आप तो अहिंसा के पुजारी हैं। जीव हिंसा के भय से सूखी घास खाकर अपना गुजारा करते हैं। लेकिन फिर हिंसा का यह उपकरण तलवार क्यों आपके साथ है?’

ब्राह्मण ने जवाब दिया- ‘मैं कुछ लोगों को दंडित करना चाहता हूं। आपके शत्रु कौन हैं? अर्जुन ने जिज्ञासा जाहिर की।’

ब्राह्मण ने कहा ‘मैं चार लोगों को खोज रहा हूं, ताकि उनसे अपना हिसाब चुकता कर सकूं। सबसे पहले तो मुझे नारद की तलाश है।

नारद मेरे प्रभु को आराम नहीं करने देते, सदा भजन-कीर्तन कर उन्हें जागृत रखते हैं। फिर मैं द्रौपदी पर भी बहुत क्रोधित हूं। उसने मेरे प्रभु को ठीक उसी समय पुकारा, जब वह भोजन करने बैठे थे।

उन्हें तत्काल खाना छोड़ पांडवों को दुर्वासा ऋषि के शाप से बचाने जाना पड़ा। शबरी जिन्होंने उसने मेरे भगवान को जूठा खाना खिलाया।

तब अर्जुन ने पूछा आपका तीसरा शत्रु कौन है? वह है हृदयहीन प्रह्लाद। उस निर्दयी ने मेरे प्रभु को गरम तेल के कड़ाह में प्रविष्ट कराया, हाथी के पैरों तले कुचलवाया और अंत में खंभे से प्रकट होने के लिए विवश किया।

चौथा शत्रु है अर्जुन। उसकी दुष्टता देखिए। उसने मेरे भगवान को अपना सारथी बना डाला। उसे भगवान की असुविधा का थोड़ा भी ध्यान नहीं रहा। कितना कष्ट हुआ होगा मेरे प्रभु को। यह कहते ही ब्राह्मण की आंखों में आंसू आ गए।

यह देख अर्जुन का घमंड चूर-चूर हो गया। उसने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगते हुए कहा मान गया प्रभु, इस संसार में न जाने आपके कितने तरह के भक्त हैं। मैं तो कुछ भी नहीं हूं।

Hindi to English

One day, Lord Shri Krishna took Arjuna along with him. On the way, his gift came from a poor Brahmin. His behaviour was a little strange.

He was eating dry grass and hanging his sword from his waist. Arjun asked him- ‘You are a priest of non-violence. The creatures live by eating hay from the fear of violence. But why this sword of violence is with you? ‘

Brahmin replied – ‘I want to punish some people. Who are your enemies Arjun expressed his curiosity. ‘

Brahman said, ‘I am searching for four people so that I can pay my account to them.’ First of all, I am looking for Narada.

Narada does not allow my Lord to rest, always keep them awake with devotion and devotion. Then I am also angry with Draupadi. He called my lord right when he sat down to eat.

The Pandavas had to save them immediately from the curse of Durvasa Rishi. Shabari who fed me my food to my god.

Then Arjun asked who is your third enemy? She is heartless Prahlad The ruthless man put my lord in the pan of hot oil, crushed under the feet of the elephant and finally constrained him to appear from the pillars.

The fourth enemy is Arjuna. Look at his wickedness. He made my God his own charioteer. He did not care even a little bit of God’s inconvenience. How terrible will my Lord be! It is said that tears came in the eyes of the Brahmin.

Seeing Arjun’s pride was shattered. He apologized to Shri Krishna and said, Lord, how many kinds of devotees you do not know in this world. I am nothing.

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