Tuesday , 7 February 2017
Latest Happenings
Home » Gyan Ganga » Guru_Profile » Hanumaan » भगवान हनुमान के चरित्र से शिक्षा

भगवान हनुमान के चरित्र से शिक्षा

bhagavaan-hanumaan-ke-charitr-se-shiksha

bhagavaan-hanumaan-ke-charitr-se-shiksha

bhagavaan hanumaan ke charitr se shiksha

bhagavaan hanumaan ke charitr se shiksha

सचिव कैसा होना चाहिए और उसे सचिव धर्म का पालन किस प्रकार करना चाहिए, इसका उत्तम उदाहरण श्रीहनुमान जी ने दिखाया है । महाबली वाली के दुरत्यय आघात के कारण सुग्रीव को त्रैलोक्य में कहीं ठिकाना नहीं रह गया था । ऐसे दीन, निराश्रय जन का साथ देकर महाबली वाली से वैर मोल लेना मामूली बात नहीं थी । ऐसी दुर्व्यवस्था में भी आप उनके मंत्रित्व – पद पर दृढ़ रहकर सदा सहायता करने में लगे रहे । यह परम साहसिकता और सच्ची प्रीति की पहली शिक्षा है । इतना ही नहीं, अंत में श्रीरामचंद्र जी से सुग्रीव की मित्रता करवा आपने उसको निर्भय कर दिया और इस प्रकार नीति के एक उच्च सिद्धांत को कार्यरूप में परिणत करके दिखा दिया कि राजा के सात अंगों में से यदि एक सर्वप्रधान अंग मंत्री बचा रहे तो शेष सब नष्ट हो जाने पर भी राज्य को पुन: प्राप्त कर सकना पात्रों के केवल मंत्री ही बच रहे थे – ‘तहं रह सचिव सहित सुग्रीवा, ‘सचिव संग लै नभ पथ गयऊ ।’ इससे अंत में दोनों के ही मनोरथ सफल हुए ।

श्रीहनुमान जी के संग से उपलब्ध श्रीरामकृपा से सुग्रीव जी राज्यासन पर विराजते हैं, परंतु जब राजमद के कारण ‘रमाविलास’ में रम जाते हैं तब श्रीहनुमान जी बड़ी ही दूरदर्शिता से आदर्श विनयपूर्वक सुग्रीव को सब प्रकार से सचेत कर देते हैं । सुग्रीव की अनुमति लेकर स्वयं दूतों को सम्मानपूर्वक बुलाते हैं और भय तथा प्रीति दिखाकर वानरों को बुलाने के लिए तुरंत भेज देते हैं । यदि आपने ऐसा न किया होता तो सुग्रीव पर कितना बड़ा कोपाक्रमण होता ।

जब वानर सेना इकट्ठे हो गये और श्री सीता जी की खोज में भेजे जाने लगे, तब आपका दल भी दक्षिण दिशा की ओर चला । उस समय सबसे पीछे आपने श्रीरघुनाथ जी के चरणों में शिरसा प्रणाम किया । श्रीराम जी ने इनको निकट बुलाकर अपने भक्तभयहारी कोमल कर कमल इनके मस्तक पर रख दिए और अपना ही जन जानकर सहिदान के निमित्त मुद्रि का दे दी । फिर श्रीरघुनाथ जी बोले –

आज श्रीहनुमान जी का जीवन सफल हो गया । उन्होंने सोचा कि मेरे समान बड़भागी कौन होगा, जिसके मस्तक पर मेरे नाथ ने आज पाप, ताप और माया – तीनों को एक साथ मिटा देने वाले कर – कमल रख दिए । श्रीहनुमान जी लंकादहन करते हैं । वहां चारों तरफ हाहाकार मच जाता है । अगणित जीव जलकर भस्म हो जाते हैं । इनकी गर्जना को सुनकर अनेक राक्षस – नारियों के गर्भपात हो जाते हैं । यह सब हुआ, परंतु आजतक किसी ने स्वप्न में भी ऐसी शंका नहीं की कि हनुमान जी को ऐसा करने में कोई पाप लगा । करते भी कैसे ? जिसके मस्तक पर परम कारुणिक का अभय हस्त फिर गया, उसमें पाप कहां ? यों तो आप स्वाभाविक ही त्रिविध ताप से मुक्त हैं, परंतु यहां उस ताप के संबंध में कहना है, जिससे आपने सारी लंका को तप्त कर दिया था । आपकी पूंछ में लगायी हुई अग्नि जिस समय प्रलयाग्नि या बड़वानल भी उसके सामने तुच्छ थे । अग्निशिखाएं मानो काल – रसना के सदृश सबको चाट रही थीं । मूसलधार वृष्टि भी उस समय घृताहुतियों के सदृश अग्नि को अधिकाधिक प्रचण्ड कर रही थी । समुद्र का जल भी उबल रहा था । ऐसी विकट स्थिति में आप सहज ही एक मंदिर से दूसरे मंदिर पर उछल रहे हैं, सारा शरीर रोम से आवृत है, परंतु अग्नि की आंच से आपका बाल भी बांका नहीं होता ।

कैसा आश्चर्य है ! बात यह है कि ‘गोपल सिंधु अनल सितलाई’ – की प्रभुतावाले प्रभु का अभय हस्त जिनके सिर पर रखा गया, उनके लिए ताप की संभावना ही नहीं रहती ।

अब रही माया की बात, श्रीहनुमान जी को तीनों प्रकार की गुणमयी माया का सामना करना पड़ा, परंतु आप सबका पराभव करते हुए करते हुए आगे बढ़े हैं । सतोगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी – तीनों ही मायाओं से सामना करना पड़ा । देवलोक से आयी हुई सुरसा सतोगुणी, अधोनिवासिनी सिंहिका, जो उड़ते हुए पक्षियों की छाया को पकड़कर उन्हें खींच लेती थी, तमोगुणी और मध्यलोकस्थ लंकानिवासिनी लंकिनी रजोगुणी थी ।

इसके बाद श्रीहनुमान जी अब लंका में आकर विभीषण जी से मिलते हैं और उनको अंतर बाहर से भक्त समझ उनके बतलाये हुए मार्ग अशोकवाटिका में पहुंच माता सीता का साक्षात्कार करते हैं । भक्ति माता की खोज में निरत साधक को सद्गुरु चाहिए । यहां हनुमान रूपी जीव को विभीषणरूप सद्गुरु की प्राप्ति हुई । तदंतर भक्तिरूपी सीता के दर्शन हुए । इस प्रसंग में यह विशेष ध्यान देने योग्य बात है कि माया से छुटकारा पाने पर भी संत – समागम के बिना यथार्थ भक्ति की प्राप्ति नहीं होती । इसके सिवा साधक को खोटा – खरा भलीभांति पहचान कर ही किसी को गुरु बनाना चाहिए । इसकी विधि भी यहीं बतला दी है । घर के बाहर श्रीराम – नाम – अंकित और तुलसी का वृक्ष देखकर ही हनुमान जी ने तुरंत विश्वास नहीं कर लिया, जब विभीशण जगकर ‘राम – राम’ कहने लगे, तब विश्वास किया । क्योंकि रामायणांतर्गत प्रतापभानु की कथा से ही यह प्रकट है कि जगत में साधुवेश घोर असाधु भी स्वार्थ साधन के निमित्त निवास करते हैं ।

फिर विभीषणोपदिष्ट मार्ग से असोकवाटिका में पहुंचे । भक्तराज विभीषण की शिक्षा से सीता जी की सन्निधि प्राप्त कर आपने स्वामी की मुद्रिका माता को प्रदान की । मुद्रिका प्रदान में भी एक रहस्य है । भक्ति के लिये जो कुछ साधक भेंट करता है, वह वस्तु होती क्या है ? केवल प्रभु की दी हुई ही । अन्यथा बेचारा जीव प्रभु – प्रसाद के अतिरिक्त किसी वस्तु को कहां से पाता ? यह बड़ा रहस्यपूर्ण प्रसंग है ।श्रीहनुमान जी के निकट जाने पर माता जी पूरी परीक्षा लेने का विचार कर मुंह फेर बैठ गयीं ।

तदंतर जब हनुमान जी ने रामभक्त होने के परिचय में सहिदानी मुद्रिका का लक्ष्य कराते और ‘करुनानिधान’ नाम की सत्य शपथ करते हुए उनका दास होने की सूचना देकर पूर्णरूप से विश्वास दिलाया, तब माता ने उन्हें मन, कर्म, वचन से ‘कृपासिंधु’ का दास जान परम प्रसन्न हुई और पुलकित होकर संतुष्ट मन से आशीर्वाद प्रदान किया । यहां श्रीहनुमान ने यह प्रमाणित कर दिया कि भगवत प्रेमियों को प्रभु की कृपा के अतिरिक्त कुछ और नहीं चाहिए ।

श्रीहनुमान से जुड़े प्रसंगों के यह तो सिर्फ अंश मात्र हैं । प्रभु का जीवन सेवा और पुरुषार्थ का नमूना है और इससे हमें यह अन्यतम शिक्षा प्राप्त होती है कि भगवान की सेवा के साथ – साथ पुरुषार्थ करने से भगवान की कृपादृष्टि होती है और जीवन सफल हो जाता है ।

wish4me to English

sachiv kaisa hona chaahie aur use sachiv dharm ka paalan kis prakaar karana chaahie, isaka uttam udaaharan shreehanumaan jee ne dikhaaya hai . mahaabalee vaalee ke duratyay aaghaat ke kaaran sugreev ko trailoky mein kaheen thikaana nahin rah gaya tha . aise deen, niraashray jan ka saath dekar mahaabalee vaalee se vair mol lena maamoolee baat nahin thee . aisee durvyavastha mein bhee aap unake mantritv – pad par drdh rahakar sada sahaayata karane mein lage rahe . yah param saahasikata aur sachchee preeti kee pahalee shiksha hai . itana hee nahin, ant mein shreeraamachandr jee se sugreev kee mitrata karava aapane usako nirbhay kar diya aur is prakaar neeti ke ek uchch siddhaant ko kaaryaroop mein parinat karake dikha diya ki raaja ke saat angon mein se yadi ek sarvapradhaan ang mantree bacha rahe to shesh sab nasht ho jaane par bhee raajy ko pun: praapt kar sakana paatron ke keval mantree hee bach rahe the – ‘tahan rah sachiv sahit sugreeva, ‘sachiv sang lai nabh path gayoo .’ isase ant mein donon ke hee manorath saphal hue .

shreehanumaan jee ke sang se upalabdh shreeraamakrpa se sugreev jee raajyaasan par viraajate hain, parantu jab raajamad ke kaaran ‘ramaavilaas’ mein ram jaate hain tab shreehanumaan jee badee hee dooradarshita se aadarsh vinayapoorvak sugreev ko sab prakaar se sachet kar dete hain . sugreev kee anumati lekar svayan dooton ko sammaanapoorvak bulaate hain aur bhay tatha preeti dikhaakar vaanaron ko bulaane ke lie turant bhej dete hain . yadi aapane aisa na kiya hota to sugreev par kitana bada kopaakraman hota .

jab vaanar sena ikatthe ho gaye aur shree seeta jee kee khoj mein bheje jaane lage, tab aapaka dal bhee dakshin disha kee or chala . us samay sabase peechhe aapane shreeraghunaath jee ke charanon mein shirasa pranaam kiya . shreeraam jee ne inako nikat bulaakar apane bhaktabhayahaaree komal kar kamal inake mastak par rakh die aur apana hee jan jaanakar sahidaan ke nimitt mudri ka de dee . phir shreeraghunaath jee bole –

aaj shreehanumaan jee ka jeevan saphal ho gaya . unhonne socha ki mere samaan badabhaagee kaun hoga, jisake mastak par mere naath ne aaj paap, taap aur maaya – teenon ko ek saath mita dene vaale kar – kamal rakh die . shreehanumaan jee lankaadahan karate hain . vahaan chaaron taraph haahaakaar mach jaata hai . aganit jeev jalakar bhasm ho jaate hain . inakee garjana ko sunakar anek raakshas – naariyon ke garbhapaat ho jaate hain . yah sab hua, parantu aajatak kisee ne svapn mein bhee aisee shanka nahin kee ki hanumaan jee ko aisa karane mein koee paap laga . karate bhee kaise ? jisake mastak par param kaarunik ka abhay hast phir gaya, usamen paap kahaan ? yon to aap svaabhaavik hee trividh taap se mukt hain, parantu yahaan us taap ke sambandh mein kahana hai, jisase aapane saaree lanka ko tapt kar diya tha . aapakee poonchh mein lagaayee huee agni jis samay pralayaagni ya badavaanal bhee usake saamane tuchchh the . agnishikhaen maano kaal – rasana ke sadrsh sabako chaat rahee theen . moosaladhaar vrshti bhee us samay ghrtaahutiyon ke sadrsh agni ko adhikaadhik prachand kar rahee thee . samudr ka jal bhee ubal raha tha . aisee vikat sthiti mein aap sahaj hee ek mandir se doosare mandir par uchhal rahe hain, saara shareer rom se aavrt hai, parantu agni kee aanch se aapaka baal bhee baanka nahin hota .

kaisa aashchary hai ! baat yah hai ki ‘gopal sindhu anal sitalaee’ – kee prabhutaavaale prabhu ka abhay hast jinake sir par rakha gaya, unake lie taap kee sambhaavana hee nahin rahatee .

ab rahee maaya kee baat, shreehanumaan jee ko teenon prakaar kee gunamayee maaya ka saamana karana pada, parantu aap sabaka paraabhav karate hue karate hue aage badhe hain . satogunee, rajogunee aur tamogunee – teenon hee maayaon se saamana karana pada . devalok se aayee huee surasa satogunee, adhonivaasinee sinhika, jo udate hue pakshiyon kee chhaaya ko pakadakar unhen kheench letee thee, tamogunee aur madhyalokasth lankaanivaasinee lankinee rajogunee thee .

isake baad shreehanumaan jee ab lanka mein aakar vibheeshan jee se milate hain aur unako antar baahar se bhakt samajh unake batalaaye hue maarg ashokavaatika mein pahunch maata seeta ka saakshaatkaar karate hain . bhakti maata kee khoj mein nirat saadhak ko sadguru chaahie . yahaan hanumaan roopee jeev ko vibheeshanaroop sadguru kee praapti huee . tadantar bhaktiroopee seeta ke darshan hue . is prasang mein yah vishesh dhyaan dene yogy baat hai ki maaya se chhutakaara paane par bhee sant – samaagam ke bina yathaarth bhakti kee praapti nahin hotee . isake siva saadhak ko khota – khara bhaleebhaanti pahachaan kar hee kisee ko guru banaana chaahie . isakee vidhi bhee yaheen batala dee hai . ghar ke baahar shreeraam – naam – ankit aur tulasee ka vrksh dekhakar hee hanumaan jee ne turant vishvaas nahin kar liya, jab vibheeshan jagakar ‘raam – raam’ kahane lage, tab vishvaas kiya . kyonki raamaayanaantargat prataapabhaanu kee katha se hee yah prakat hai ki jagat mein saadhuvesh ghor asaadhu bhee svaarth saadhan ke nimitt nivaas karate hain .

phir vibheeshanopadisht maarg se asokavaatika mein pahunche . bhaktaraaj vibheeshan kee shiksha se seeta jee kee sannidhi praapt kar aapane svaamee kee mudrika maata ko pradaan kee . mudrika pradaan mein bhee ek rahasy hai . bhakti ke liye jo kuchh saadhak bhent karata hai, vah vastu hotee kya hai ? keval prabhu kee dee huee hee . anyatha bechaara jeev prabhu – prasaad ke atirikt kisee vastu ko kahaan se paata ? yah bada rahasyapoorn prasang hai .shreehanumaan jee ke nikat jaane par maata jee pooree pareeksha lene ka vichaar kar munh pher baith gayeen .

tadantar jab hanumaan jee ne raamabhakt hone ke parichay mein sahidaanee mudrika ka lakshy karaate aur ‘karunaanidhaan’ naam kee saty shapath karate hue unaka daas hone kee soochana dekar poornaroop se vishvaas dilaaya, tab maata ne unhen man, karm, vachan se ‘krpaasindhu’ ka daas jaan param prasann huee aur pulakit hokar santusht man se aasheervaad pradaan kiya . yahaan shreehanumaan ne yah pramaanit kar diya ki bhagavat premiyon ko prabhu kee krpa ke atirikt kuchh aur nahin chaahie .

shreehanumaan se jude prasangon ke yah to sirph ansh maatr hain . prabhu ka jeevan seva aur purushaarth ka namoona hai aur isase hamen yah anyatam shiksha praapt hotee hai ki bhagavaan kee seva ke saath – saath purushaarth karane se bhagavaan kee krpaadrshti hotee hai aur jeevan saphal ho jaata hai

Comments

comments