Thursday , 13 July 2017
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1 रुपया देकर उन्होंने भिखारी को बना दिया था बड़ा व्यापारी

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1 रुपया देकर उन्होंने भिखारी को बना दिया था बड़ा व्यापारी

1 रुपया देकर उन्होंने भिखारी को बना दिया था बड़ा व्यापारी

भारतीय समाजसुधारक, शिक्षाविद् और स्वतंत्रता सेनानी ईश्वर चंद्र विद्यासागर का 1820 में जन्म हुआ था। विद्यासागर के जीवन से जुड़े प्रेरक प्रसंग आज भी प्रासंगिक है और बेहतर समाज की नींव रखने में सहायक हो सकते हैं। पेश है इस महापुरुष के जीवन से जुड़ी दो सच्ची घटनाएें –

एक रुपया देकर उसे बना दिया बड़ा व्यापारी

यह तब की बात है जब विद्यासागर कोलकाता में पढ़ाते थे। उनका वेतन इतना ही था कि गुजारा हो सके। ऐसे में भी वे जरुरतमंदों की मदद में पीछे नहीं रहते थे। एक दिन की बात है। विद्यासागर बाजार से गुजर रहे थे, तभी एक युवक आगे आया और भीख में एक आना मांगने लगा। विद्यासागर ने देखा, युुवक हट्टा-कट्टा है, फिर भी भीख मांग रहा है। उन्होंने युवक से बात की और उसकी परेशानी समझी।

सारी बात सुनने के बाद विद्यासागर ने कहा, यदि मैं तुम्हें एक रुपया दूं तो तुम उसका क्या करोगे? युवक बोला- मैं कुछ सामान खरीदूंगा और गली में घूम-घूमकर उसे बेचूंगा। इस तरह मुनाफा कमाने की कोशिश करूंगा। विद्यासागर प्रभावित हुए। उन्होंने उसे एक आने के बजाए एक रुपया दिया और अपने रास्ते चल दिए।

युवक ने एक रुपए से छोटा-मोटा धंधा शुरू किया। खूब मेहनत की। धीरे-धीरे व्यापार बढ़ने लगा और वह देखते ही देखते बड़ा आदमी बन गया। कुछ माह बाद विद्यासागर का उसी रास्ते से गुजरना हुआ। वे अपनी धून में जा रहे थे, तभी अच्छे पकड़े पहने एक नौजवान आया और पैर छूने लगा। विद्यासागर कुछ समझ नहीं पाए। पूछने पर युवक ने बताया कि वह वही शख्स है, जिसे विद्यासागर ने एक रुपया दिया था और अब वह बड़ा व्यापारी बन गया है।

…जब विद्यासागर बने कुली

एक बार विद्यासागर ट्रेन से कलकत्ता से वर्द्धमान आ रहे थे। उनकी बोगी में एक नौजवान भी था, जिसने बहुत अच्छे कपडे पहन रखे थे। वर्द्धमान पहुंचने पर वह कुली तलाशने लगा ता कि सामान उठाया जा सके। कुली नहीं मिला, तो परेशान होने गया। इस पर विद्यासागर ने कहा, लाओ, मैं तुम्हारा सामान उठा लेता हूं। युवक खुश हो गया। बोला- मैं आपकी पूरी मजदूरी दूंगा। घर पहुंचकर वह नवयुवक विद्यासागर को पैसे देने लगा, लेकिन उन्होंने नहीं लिए।

अगले दिन वर्द्धमान में विद्यासागर के स्वागत के लिए बहुत से लोग जमा हुए। वह नवयुवक भी वहां आया। उसने देखा की यह तो वही व्यक्ति है जो कल मेरा सामान लेकर आया था। उसे आश्चर्य हुआ और शर्म भी आई। सभा समाप्त हुई तब वह विद्यासागर के पास गया और पैरो पर गिरकर माफी मांगी। विद्यासागर ने समझाया कि अपना काम स्वयं करना चाहिए।

Hindi to English

Indian social reformer, educationist and freedom fighter Ishwar Chandra Vidyasagar was born in 1820. Inspiring events related to Vidyasagar’s life are still relevant and can be helpful in laying the foundations of a better society. Presenting two true events related to the life of this great man –

Made a big dealer by giving a rupee

It was then that when Vidyasagar used to teach in Kolkata His salary was so much that he could be saved. In such a situation, he did not remain behind in the help of the needy. Once upon a time When Vidyasagar was passing through the market, a young man came forward and started demanding one come in begging. Vidyasagar has seen, Yuukta Hatta-Katta is still asking for begging. They talked to the young man and understood his problem.

After listening to all the facts, Vidyasagar said, if I give you a rupee, then what will you do with it? Tell the young man – I will buy some stuff and walk around the street and sell it. In this way, I will try to earn profits. Vidyasagar was affected. They gave him one rupee instead of coming one and walked his way.

The young man started a small business with a rupee. Worked very hard. Slowly the business started to grow and after seeing it he became a big man. A few months later, Vidyasagar had to go through the same route. They were going in their tunes, then a young man wearing a good catch came and touched his feet. Vidyasagar could not understand anything. On asking, the youth told that he was the same person whom Vidyasagar gave a rupee and now he has become a big businessman.

… when a schoolboy became a porter

Once the Vidyasagar train was coming from Calcutta, Vardhaman was coming. There was also a young man in his bogie, who used to wear very good clothes. Upon reach Wardram, he started searching for the porter to pick up the luggage. The porter did not get it, then got upset On this Vidyasagar said, bring me, I pick up your luggage. The young man was happy. Speak – I will pay all your wages. Upon reaching home, he started giving money to the Yuva Udyog Vidyasagar, but he did not.

The next day, many people gathered for the welcome of Vidyasagar in Vardhaman. The young man also came there. He saw that this is the same person who brought my luggage yesterday. She was surprised and even shy. After the meeting ended, he went to the Vidyasagar and apologized for falling on the feet. Vidyasagar explained that his work should be done by himself.

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