Sunday , 18 February 2018
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डाँकू रत्नाकर और देवऋषि नारद | उपनिषद् की कहानियां

danku-ratnakar-and-devhishi-narada-upanishads-stories

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बहुत समय पहले की बात है किसी राज्य में एक बड़े ही खूंखार डाँकू  का भय व्याप्त था।  उस डाँकू का नाम रत्नाकर था।  वह अपने साथियों के साथ जंगल से गुजर रहे राहगीरों को लूटता और विरोध करने पर उनकी हत्या भी कर देता।  एक बार देवऋषि नारद भी उन्ही जंगलों से भगवान का जप करते हुए जा रहे थे। जब वे घने बीहड़ों में पहुंचे तभी उन्हें कुछ लोग विपरीत दिशा में भागते हुए दिखे।

देवऋषि ने उनसे ऐसा करने का कारण पूछा तो सभी ने मार्ग में रत्नाकर के होने की बात बतायी। पर बावजूद इसके देवऋषि आगे बढ़ने लगे।

“क्या आपको भय नहीं लगता ?” , भाग रहे लोगों ने उन्हें ऐसा करते देख पुछा।

“नहीं, मैं मानता ही नहीं की मेरे आलावा यहाँ कोई और है , और भय तो हमेशा किसी और के होने से लगता है , स्वयं से नहीं। “, ऋषि ने ऐसा कहते हुए अपने कदम आगे बढ़ा दिए।

कुछ ही दूर जाने पर  डाँकू रत्नाकर अपने साथियों के साथ उनके समक्ष आ पहुंचा।

रत्नाकर –   नारद , मैं रत्नाकर हूँ , डाँकू रत्नाकर।

नारद मुस्कुराते हुए बोले – मैं नारद हूँ देवऋषि नारद , तुम्हारा अतिथि और मैं निर्भय हूँ। क्या तुम निर्भय हो ?

रत्नाकर – क्या मतलब है तुम्हारा ?

नारद – ना मुझे प्राणो का भय है , ना असफलता का , ना कल का ना कलंक का, और कोई भय है जो तुम जानते हो ? अब तुम बताओ क्या तुम निर्भय हो ?

रत्नाकर – हाँ, मैं निर्भय हूँ , ना मुझे प्राणो का भय है , ना असफलता का , ना कल का ना कलंक का

नारद – तो तुम यहाँ इन घने जंगलों में छिप कर क्यों रहते हो ? क्या राजा से डरते हो ?

रत्नाकर – नहीं !

नारद – क्या प्रजा से डरते हो ?

रत्नाकर- नहीं !

नारद- क्या पाप से डरते हो ?

रत्नाकर – नहीं !

नारद – तो यहाँ छिप कर क्यों रहते हो ?

यह सुनकर रत्नाकर घबरा गया और एकटक देवऋषि को घूरने लगा।

नारद – उत्तर मैं देता हूँ। तुम पाप करते हो और पाप से डरते हो।

रत्नाकर हँसते हुए बोला – नारद तुम अपनी इन बातों से मुझे भ्रमित नहीं कर सकते।  ना मैं पाप से डरता हूँ , ना पुण्य से , ना देवताओं से ना दानवों से , ना राजा से ना राज्य से , ना दंड से ना विधान से। मैंने राज्य के साथ द्रोह किया है, मैंने समाज के साथ द्रोह किया है, इसलिए मैं यहाँ इन बीहड़ों में रहता हूँ। ये प्रतिशोध है मेरा।

नारद – क्या था वो पाप जिससे तुम डरते हो ?

रत्नाकर- मुझे इतना मत उकसाओ की मैं तुम्हारी हत्या कर दूँ नारद । इतना तो मैं जान ही चुका हूँ कि पाप और पुण्य की परिभाषा हमेशा ताकतवर तय करते हैं और उसे कमजोरों पर थोपते हैं।  मैंने साम्राज्यों का विस्तार देखा है, हत्या से, बल से , छल से , मैंने वाणिज्य का विस्तार देखा है , कपट से , अनीति से , अधर्म से , वो पाप नहीं था ? मैं सैनिक था , दुष्ट और निर्दयी सौदागरों की भी रक्षा की… वो पाप नहीं था ? युद्ध में हारे हुए लोगों की स्त्रीयों के साथ पशुता का व्यवहार करने वाले सैनिकों की हत्या क्या की मैंने , मैं पापी हो गया ? राजा , सेना और सेनापति का अपराधी हो गया मैं। क्या वो पाप था ?

नारद – दूसरों का पाप अपने पाप को सही नहीं ठहरा सकता रत्नाकर।

रत्नाकर चीखते हुए – मैं पापी नहीं हूँ।

नारद – कौन निर्णय करेगा ? वो जो इस यात्रा में तुम्हारे साथ हैं या नहीं हैं ? क्या तुम्हारी पत्नी , तुम्हारा पुत्र, इस पाप में तुम्हारे साथ हैं ?

रत्नाकर – हाँ , वो क्यों साथ नहीं होंगे, मैं जो ये सब करता हूँ , उनके सुख के लिए ही तो करता हूँ।

नारद – तो जो तुम्हारे साथ हैं उन्ही को निर्णायक बनाते हैं।  जाओ , अपनी पत्नी से,  अपने पुत्र से , अपने पिता से, अपने निकट सम्बन्धियों से पूछ कर आओ, जो तुम कर रहे हो , क्या वो पाप नहीं है , और क्या वे सब इस पाप में तुम्हारे साथ हैं ? इस पाप के भागीदार हैं ?

रत्नाकर – ठीक है मैं अभी जाकर लौटता हूँ।

और अपने साथियों को नारद को बाँध कर रखने का निर्देश देकर रत्नाकर सीधा अपनी पत्नी के पास जाता है और उससे पूछता है – ” ये मैं जो कर रहा हूँ , क्या वो पाप है ? क्या तुम इस पाप में मेरी भागीदार हो? “

पत्नी कहती है , ” नहीं स्वामी , मैंने आपके सुख में , दुःख में साथ देने की कसम खाई है , आपके पाप में भागीदार बनने की नहीं।  “

यह सुन रत्नाकर स्तब्ध रह जाता है।  फिर वह अपने अंधे पिता के समक्ष यही प्रश्न दोहराता है , ” पिताजी ,ये जो मैं कर रहा हूँ , क्या वो पाप है ? क्या आप इस पाप में मेरी भागीदार हैं ? “

पिताजी बोलते हैं , ” नहीं पुत्र, ये तो तेरी कमाई है , इसे मैं कैसे बाँट सकता हूँ। “

यह सुनते ही मानो रत्नाकर पर बिजली टूट पड़ती है।  वह बेहद दुखी हो जाता है और धीरे – धीरे चलते हुए वापस देवऋषि नारद के पास पहुँच जाता है।

नारद- तुम्हारे साथी मुझे अकेला छोड़ जा चुके हैं रत्नाकर।

रत्नाकर , देवऋषि के चरणो में गिरते हुए  – क्षमा देवऋषि क्षमा, अब तो मैं भी अकेला ही हूँ।

नारद – नहीं रत्नाकर , तुम्ही अपने मित्र , और तुम्ही अपने शत्रु हो , तुम्हारे पुराने संसार की रचना भी तुम्ही ने की थी.. तुम्हारे नए संसार की रचना भी तुम्ही करोगे।  इसलिए उठो और अपने पुरुषार्थ से अपना भविष्य लिखो …. राम-राम , तुम्हारा पथ सुबह हो।

मित्रों , इस घटना के पश्चात डाकू रत्नाकर का जीवन पूरी तरह बदल गया, उसने पाप के मार्ग को त्याग पुण्ये के मार्ग को अपनाया और आगे चलकर यही डाँकू राम-कथा का रचयिता मह्रिषी वाल्मीकि बना।

उपनिषदों से ली गयी यह कथा बताती है कि मनुष्य असीम संभावनाओं का स्वामी है , जहां एक तरफ वह अपने पुरुषार्थ से राजा बन सकता है तो वहीँ अपने आलस्य से रंक भी।  वह अपने अविवेक से अपना नाश कर सकता है तो अपने विवेक से अपना निर्वाण भी। यानि , हम सब अपने आप में महाशक्तिशाली हैं, पर हममें से ज्यादातर लोग पूरे जीवन काल में अपनी असीम शक्तियों का एक छोटा सा हिस्सा भी प्रयोग नहीं कर पाते।  क्यों ना हम भी डाँकू रत्नाकर की तरह सामान्यता को त्याग कर उत्कृष्टता की ओर बढ़ चलें !

 Hindi to English

Long ago, the fear of a very dreaded drunk was in some state. That dancer’s name was Ratnakar. He looted the passersby passing through the jungle with his companions and also killed him for opposing them. Once Devhishi Narada was also chanting Lord from the forests. When they reached dense rocks, only a few people ran towards them in the opposite direction.

When Devhishi asked him the reason for doing so, everyone spoke of Ratnakar being on the way. Despite this, its God search continued to move forward.

“Do not you feel scared?”, The people fleeing asked them to do this.

“No, I do not believe there is anyone else besides me, and fear always seems to be from someone else, not from myself. “, Rishi has stepped forward in saying this.

On reaching a distance, Danku Ratnakar came to meet with his companions.

Ratnakar – Narada, I am Ratnakar, Danku Ratnakar.

Narad smiled – I am Narada, Goddess Narada, your guest and I am fearless. Are you fearless

Ratnakar – what do you mean?

Narad – Do not I have fear of life, no failure, neither tomorrow nor a blot, and there is no fear that you know? Now you tell me, are you fearless?

Ratnakar – Yes, I am fearless, neither do I have fear of life, nor failure, neither tomorrow nor blot

Narada – why do you keep afraid here in these dense forests? Are you afraid of the king?

Ratnakar – No!

Narada – what are you afraid of the people?

Ratnakar – No!

Narad- What are you afraid of sin?

Ratnakar – No!

Narada – why do you keep hiding here?

Ratnakar was frightened by hearing this and stared at the monstrous Godhead.

Narada – I give the answer. You sin and are afraid of sin.

Ratnakar laughed and said – Narada, you can not confuse me with these things. No, I am afraid of sin, neither by virtue, nor by Gods nor by demons, nor by king nor by state, nor by penalties, by legislation. I have betrayed the state, I have betrayed the society, so I live in these ravages here. This retribution is mine.

Narada – What was the sin that you are afraid of?

Ratnakar- Do not provoke me so much that I kill you Narada. So much so that I have known that the definition of sin and virtue always determines power and imposes it on weak people. I have seen the expansion of empires, murder, force, deception, I have seen the expansion of commerce, the hypocrisy, the immorality, the sin, he did not sin? I was a soldier, also protected the wicked and merciless merchants … was not that sin? What was the murder of soldiers who lost their lives in the war with the women of the animal, who were treated like animalism, I became a sinner? The king, the army, and the commander became guilty. Was that sin?

Narada – The sins of others cannot justify their sins Ratnakar

Ratnakar shouting – I am not a sinner.

Narada – Who will decide? Are those who are with you on this journey or not? Is your wife, your son, with you in this sin?

Ratnakar – Yes, why they will not be together, I do all this, only for their happiness. So those who are with you make them judicious. Go, my wife, my son, my father, come to ask their close relatives, who are you, what is not sin, and what they are with you in this sin? Are partners of this sin?

Ratnakar – OK, I just go back and return.

And his companions went to Ratnakar a direct instruction to bind to Narada his wife and asks – “What am I doing that, whether it is a sin? Are you my partner in this sin? ”

The wife says, “No Swamy, I have vowed to support you in your happiness, in the grief, not to be a partner in your sin. ”

It is stunned to hear Ratnakar. Then he repeats the same question to his blind father, “Father, this is what I am doing, is that sin?” Are you my partner in this sin? ”

Dad says, “No son, this is your earning, how can I divide it. ”

As soon as you hear this, the power is broken down on Ratnakar. He becomes very unhappy and walks slowly and goes back to Devishi Narada.

Narada- Your partner has left me alone Ratnakar

Ratnakar, falling down in the steps of the Goddess – forgiving God, forgiveness, now I am also alone.

Narad – No Ratnakar, you are your friend, and you are your enemy, you created the creation of your old world. You will also be composed of your new world. So get up and write your future with your happiness… Ram-Ram, your path will be in the morning.

Friends, after this incident, the life of the robber Ratnakar changed completely, he adopted the path of renunciation of the path of sin, and later on, this became the creator of Danku Ram-Katha, Maharishi Valmiki.

This story from the Upanishads tells us that man is the owner of immense possibilities, where on one side he can become a king from his youth, then he also ranks with his laziness. If he can destroy himself with his own discretion, then by his own discretion his Nirvana also That is, all of us are super-powerful, but most of us can not even use a small part of their infinite powers throughout our lifespan. Why do not we even abandon mediocrity like Danku Ratnakar and move towards excellence!

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