Monday , 18 September 2017
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अच्छे अच्छे महलों मे भी एक दिन कबूतर अपना घोंसला बना लेते है

even-in-good-palaces-pigeons-make-their-nest-one-day

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सेठ घनश्याम के दो पुत्रों में जायदाद और ज़मीन का बँटवारा चल रहा था और एक चार पट्टी के कमरे को लेकर विवाद गहराता जा रहा था , एक दिन दोनो भाई मरने मारने पर उतारू हो चले , तो पिता जी बहुत जोर से हँसे। पिताजी को हँसता देखकर दोनो भाई लड़ाई को भूल गये, और पिताजी से हँसी का कारण पुछा।

पिताजी ने कहा- इस छोटे से ज़मीन के टुकडे के लिये इतना लड़ रहे हो छोड़ो इसे आओ मेरे साथ एक अनमोल खजाना बताता हूँ मैं तुम्हे !पिता घनश्याम जी और दोनो पुत्र पवन और मदन उनके साथ रवाना हुये पिताजी ने कहा देखो यदि तुम आपस मे लड़े तो फिर मैं तुम्हे उस खजाने तक नही लेकर जाऊँगा और बीच रास्ते से ही लौटकर आ जाऊँगा !

अब दोनो पुत्रों ने खजाने के चक्कर मे एक समझौता किया की चाहे कुछ भी हो जाये पर हम लड़ेंगे नही प्रेम से यात्रा पे चलेंगे !गाँव जाने के लिये एक बस मिली पर सीट दो की मिली, और वो तीन थे, अब पिताजी के साथ थोड़ी देर पवन बैठे तो थोड़ी देर मदन ऐसे चलते-चलते लगभग दस घण्टे का सफर तय किया फिर गाँव आया।

घनश्याम दोनो पुत्रों को लेकर एक बहुत बड़ी हवेली पर गये हवेली चारों तरफ से सुनसान थी। घनश्याम ने जब देखा की हवेली मे जगह जगह कबूतरों ने अपना घोसला बना रखा है, तो घनश्याम वहीं पर बैठकर रोने लगे।

दोनो पुत्रों ने पुछा क्या हुआ पिताजी आप रो क्यों रहे है ? तो रोते हुये उस वृद्ध पिता ने कहा जरा ध्यान से देखो इस घर को, जरा याद करो वो बचपन जो तुमने यहाँ बिताया था , तुम्हे याद है पुत्र इस हवेली के लिये मैं ने अपने भाई से बहुत लड़ाई की थी, सो ये हवेली तो मुझे मिल गई पर मैंने उस भाई को हमेशा के लिये खो दिया, क्योंकि वो दूर देश में जाकर बस गया और फिर वक्त्त बदला और एक दिन हमें भी ये हवेली छोड़कर जाना पड़ा !

अच्छा तुम ये बताओ बेटा की जिस सीट पर हम बैठकर आये थे, क्या वो बस की सीट हमें मिल जायेगी ? और यदि मिल भी जाये तो क्या वो सीट हमेशा-हमेशा के लिये हमारी हो सकती है ? मतलब की उस सीट पर हमारे सिवा कोई न बैठे। तो दोनो पुत्रों ने एक साथ कहा की ऐसे कैसे हो सकता है , बस की यात्रा तो चलती रहती है और उस सीट पर सवारियाँ बदलती रहती है। पहले कोई और बैठा था , आज कोई और बैठा होगा और पता नही कल कोई और बैठेगा। और वैसे भी उस सीट में क्या धरा है जो थोड़ी सी देर के लिये हमारी है !

पिताजी फिर हँसे फिर रोये और फिर वो बोले देखो यही तो मैं तुम्हे समझा रहा हूँ ,कि जो थोड़ी देर के लिये तुम्हारा है , तुमसे पहले उसका मालिक कोई और था बस थोड़ी सी देर के लिये तुम हो और थोड़ी देर बाद कोई और हो जायेगा।
बेटा एक बात ध्यान रखना की इस थोड़ी सी देर के लिये कही अनमोल रिश्तों की आहुति न दे देना, यदि कोई प्रलोभन आये तो इस घर की इस स्थिति को देख लेना की अच्छे अच्छे महलों में भी एक दिन कबूतर अपना घोसला बना लेते है। बस बेटा मुझे यही कहना था –कि बस की उस सीट को याद कर लेना जिसकी रोज उसकी सवारियां बदलती रहती है उस सीट के खातिर अनमोल रिश्तों की आहुति न दे देना जिस तरह से बस की यात्रा में तालमेल बिठाया था बस वैसे ही जीवन की यात्रा मे भी तालमेल बिठा लेना!
दोनो पुत्र पिताजी का अभिप्राय समझ गये

शिक्षा :-मित्रों, जो कुछ भी ऐश्वर्य – सम्पदा हमारे पास है वो सबकुछ बस थोड़ी देर के लिये ही है, थोड़ी-थोड़ी देर मे यात्री भी बदल जाते है और मालिक भी। रिश्तें बड़े अनमोल होते है छोटे से ऐश्वर्य या सम्पदा के चक्कर मे कहीं किसी अनमोल रिश्तें को न खो देना !
एक दोस्त हलवाई की दुकान पर मिल गया । मुझसे कहा- ‘आज माँ का श्राद्ध है, माँ को लड्डू बहुत पसन्द है, इसलिए लड्डू लेने आया हूँ ‘
मैं आश्चर्य में पड़ गया ।  अभी पाँच मिनिट पहले तो मैं उसकी माँ से सब्जी मंडी में मिला था ।
मैं कुछ और कहता उससे पहले ही खुद उसकी माँ हाथ में झोला लिए वहाँ आ पहुँची ।

मैंने दोस्त की पीठ पर मारते हुए कहा- ‘भले आदमी ये क्या मजाक है ?
माँजी तो यह रही तेरे पास !
दोस्त अपनी माँ के दोनों कंधों पर हाथ रखकर हँसकर बोला, ‍’भई, बात यूँ है कि मृत्यु के बाद गाय-कौवे की थाली में लड्डू रखने से अच्छा है कि माँ की थाली में लड्डू परोसकर उसे जीते-जी तृप्त करूँ ।
मैं मानता हूँ कि जीते जी माता-पिता को हर हाल में खुश रखना ही सच्चा श्राद्ध है ।
आगे उसने कहा, ‘माँ को मिठाई, सफेद जामुन, आम आदि पसंद है ।
मैं वह सब उन्हें खिलाता हूँ ।

श्रद्धालु मंदिर में जाकर अगरबत्ती जलाते हैं । मैं मंदिर नहीं जाता हूँ, पर माँ के सोने के कमरे में कछुआ छाप अगरबत्ती लगा देता हूँ ।सुबह जब माँ गीता पढ़ने बैठती है तो माँ का चश्मा साफ कर के देता हूँ । मुझे लगता है कि ईश्वर के फोटो व मूर्ति आदि साफ करने से ज्यादा पुण्य माँ का चश्मा साफ करके मिलता है ।
यह बात श्रद्धालुओं को चुभ सकती है पर बात खरी है ।
हम बुजुर्गों के मरने के बाद उनका श्राद्ध करते हैं ।
पंडितों को खीर-पुरी खिलाते हैं ।

रस्मों के चलते हम यह सब कर लेते है, पर याद रखिए कि गाय-कौए को खिलाया ऊपर पहुँचता है या नहीं, यह किसे पता अमेरिका या जापान में भी अभी तक स्वर्ग के लिए कोई टिफिन सेवा शुरू नही हुई है ।
माता-पिता को जीते-जी ही सारे सुख देना वास्तविक श्राद्ध है ॥

Translate Into Hindi to English

In Seth Ghanshyam’s two sons, property and land were going on and the dispute was going deeper about a four-storied room, one day the two brothers started to die while the father laughed loudly. Seeing the father laughing, both brothers forgot the battle, and ask the reason for laughter from father.

Dad said – leave this little piece of land for fighting so much. Leave it to come, tell me a precious treasure, I am you!
Father Ghanshyam Ji and both sons Pawan and Madan accompanied him along with the father said, “If you fight with each other then I will not take you to that treasure and will come back from the middle and come back!”

Now the two sons made an agreement in the treasure trove, whatever happens, but we will not fight but will run on the journey with love!

A bus got a bus to go to the village but got two seats, and they were three, now with the father sitting in the wind for a little while, Madan went for about ten hours and then the village came.

The Ghanshyam mansion with two sons Ghanshyam was deserted from all four sides. When Ghanshyam saw that the pigeons kept their nests in place in the mansion, Ghanshyam sat there and wept there.

Both sons asked what happened to father why are you crying? Then crying that old father said, look carefully, look at this house, just remember that childhood which you spent here, you remember that for this mansion, I had fought a lot with my brother, so this mansion Got it but I lost that brother forever, because he settled in a distant country and then changed the word and one day we had to leave this mansion!

Well, you tell me, in the seat of the son we came to sit, will we get the seat of that bus? And if it is found, can it be our seat forever? This means that no one except ours can sit in that seat. So the two sons said together, how can this happen, the journey of bus goes on and the rides change in that seat. Before someone else was sitting, someone will be sitting today and no one else will sit tomorrow. And anyway there is a seat in the seat which is ours for a little while!

Dad again laughed again and then he said, ‘I am explaining to you that, that is for a while, your boss was someone else before you, for a little while you are, and after some time you will be someone else .

Son, keep in mind that for some time, do not sacrifice such precious relationships, if a temptation comes, then in one of the good palaces of the house to see this situation, the pigeons make their nests a day. Just the son had to say to me – that just remember the seat of which his riders change every day, not to sacrifice precious relationships for the seat, just as the way the bus had adjusted in the journey, Tailor the journey too!

Understood the meaning of both sons dad

Education: -Mothers, whatever the wealth we have – everything is just for a short time, the passengers also change in a little while and the boss also changes. Relationships are invaluable; do not lose any precious relationships in the life of a small austerity or wealth.

A friend found at the confectionery shop. Told me- ‘Today is the mother’s emperor, mother loves Laddus, so I have come to buy laddus’

I fell in surprise Just five minutes ago, I had met her mother in a vegetable market.

Even before I said something else, my mother came to her and took her hand in front of me.

I hit the friend’s back and said, ‘Good man, what’s this joke?’

Maamaji, so this is yours!

The friend laughed laughing at his mother’s shoulders and said, ‘Brother, it is a matter of fact that after death, it is better to keep a ladoo in a cow’s crayon plate that serving the laddus in the mother’s plate, let me live and be satisfied.

I believe that keeping alive parents alive at all times is the true Shraddha.

She further said, ‘Mother likes sweet, white berries, mango etc..

I’ll feed them all that way.

Pilgrims burn incense sticks in the temple. I do not go to the temple, but in the mother’s sleeping room, I put the turtle imprinted incense sticks.

In the morning when the mother reads the Gita, I clean the mother’s glasses. I think it is more virtuous than cleansing the photo and idols of God

The glasses of the mother get cleaned.

This thing can pierce the devotees but it is true.

We make the Shraddha after the death of the elderly.

Puddits eat pudding-puri

We do all this because of the rituals, but remember that the cow reared the cow, whether it reaches or not, who knows it.

In the US or Japan, no Tiffin service has been started for Paradise yet.

Giving all the pleasures of life to the parents is the real Shraddha.

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