Tuesday , 11 July 2017
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खोटे सिक्के भी हो जाते हैं अमर

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खोटे सिक्के भी हो जाते हैं अमर

निजामुद्दीन औलिया के एक शिष्य थे, उन्हीं की तरह त्याग और सादगी भी उन्हें पसंद थी। वे सब्जी उबाल कर बेचते थे और अपनी जीविका चलाते थे। गांव वाले श्रद्धावश सस्ती सब्जियां दे जाते और उन्हें वे उबाल कर ग्राहकों को खिलाते और थोड़ा बहुत धन अर्जित करते।

इसके साथ ही सुबह-शाम प्रवचन भी करते। लेकिन लोग उन्हें खोटे सिक्के दे जाते थे। उन्हें पता था कि लोग उनकी आंखों की कमजोरी का फायदा उठाते थे। लेकिन वे किसी से शिकायत नहीं करते थे। वे उन खोटे सिक्कों को एक घड़े में भरते जाते थे। यह सिलसिला चलता रहा।

एक दिन उनके जीवन का अंतिम क्षण आ पहुंचा। उन्होंने ईश्वर से अंतिम प्रार्थना करते हुए कहा। हे ईश्वर, मैं सारी जिंदगी लोगों से खोटे सिक्के लेता रहा हूं। अब मेरे जैसा खोटा सिक्का भी तेरे पास आ रहा है। उम्मीद है कि, तू भी इस खोटे सिक्के को स्वीकार कर लेगा। इस प्रार्थना के बाद उनके प्राण पखेरू उड़ गए।

In English

Nizamuddin was a disciple of Auliya, like him liked sacrifice and simplicity too. They used to sell and sell vegetables, and used their livelihood. The villagers were given cheap vegetables, and they used to boil and feed them to the customers and make a lot of money.

In addition to this, he used to make discourses in the morning and evening. But people used to give them false coins. They knew that people used to take advantage of their weaknesses. But they did not complain about anyone. They used to fill those false coins in a jar. This series continues.

One day the last moments of his life arrived. He said the last prayer to God, and said: O God, I have been taking false coins from people all the time. Now a false coin like me is also coming near you. Hopefully, you too will accept this false coin. After this prayer, his soul flew away.

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