Thursday , 13 July 2017
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कर्ण का दान और अर्जुन के अभिमान में श्रेष्ठ कौन

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कर्ण का दान और अर्जुन के अभिमान में श्रेष्ठ कौन

                                                               कर्ण का दान और अर्जुन के अभिमान में श्रेष्ठ कौन

जब महाराज युधिष्ठिर इंद्रप्रस्थ पर राज्य करते थे। वे काफी दान आदि भी करते थे। धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि दानवीर के रूप में फैलने लगी और पांडवों को इसका अभिमान होने लगा। एक बार कृष्ण इंद्रप्रस्थ पहुंचे। भीम व अर्जुन ने युधिष्ठिर की प्रशंसा शुरू की कि वे कितने बड़े दानी हैं।

तब कृष्ण ने उन्हें बीच में ही टोक दिया और कहा- हमने कर्ण जैसा दानवीर और नहीं सुना। पांडवों को यह बात पसंद नहीं आई। भीम ने पूछ ही लिया, कैसे? कृष्ण ने कहा कि समय आने पर बतलाऊंगा।

कुछ ही दिनों में सावन का माह शुरू हो गया और वर्षा की झड़ी लग गई। उस समय एक याचक युधिष्ठिर के पास आया और बोला, महाराज! मैं आपके राज्य में रहने वाला एक ब्राह्मण हूं और मेरा व्रत है कि बिना हवन किए कुछ भी नहीं खाता-पीता। कई दिनों से मेरे पास यज्ञ के लिए चंदन की लकड़ी नहीं है। यदि आपके पास हो तो, मुझ पर कृपा करें, अन्यथा हवन तो पूरा नहीं ही होगा, मैं भी भूखा-प्यासा मर जाऊंगा।

युधिष्ठिर ने तुरंत कोषागार के कर्मचारी को बुलवाया और कोष से चंदन की लकड़ी देने का आदेश दिया। संयोग से कोषागार में सूखी लकड़ी नहीं थी। तब महाराज ने भीम व अर्जुन को चंदन की लकड़ी का प्रबंध करने का आदेश दिया। लेकिन काफी दौड़- धूप के बाद भी सूखी लकड़ी की व्यवस्था नहीं हो पाई। तब ब्राह्मण को हताश होते देख कृष्ण ने कहा, मेरे अनुमान से एक स्थान पर आपको लकड़ी मिल सकती है, आइए मेरे साथ।

ब्राह्मण की आखों में चमक आ गई। भगवान ने अर्जुन व भीम को भी इशारा किया, वेष बदलकर वे भी ब्राह्मण के संग लिए। कृष्ण सबको लेकर कर्ण के महल में गए। सभी ब्राह्मणों के वेष में थे, अत: कर्ण ने उन्हें पहचाना नहीं। याचक ब्राह्मण ने जाकर लकड़ी की अपनी वही मांग दोहराई। कर्ण ने भी अपने भंडार के मुखिया को बुलवा कर सूखी लकड़ी देने के लिए कहा, वहां भी वही उत्तर प्राप्त हुआ।

ब्राह्मण निराश हो गया। अर्जुन-भीम प्रश्न-सूचक निगाहों से भगवान को ताकने लगे। लेकिन वे अपनी चिर-परिचित मुस्कान लिए बैठे रहे। तभी कर्ण ने कहा, हे देवता! आप निराश न हों, एक उपाय है मेरे पास। उसने अपने महल के खिड़की-दरवाजों में लगी चंदन की लकड़ी काट-काट कर ढेर लगा दी, फिर ब्राह्मण से कहा, आपको जितनी लकड़ी चाहिए, कृपया ले जाइए। कर्ण ने लकड़ी पहुंचाने के लिए ब्राह्मण के साथ अपना सेवक भी भेज दिया।

ब्राह्मण लकड़ी लेकर कर्ण को आशीर्वाद देता हुआ लौट गया। पांडव व श्रीकृष्ण भी लौट आए। वापस आकर भगवान ने कहा, साधारण अवस्था में दान देना कोई विशेषता नहीं है, असाधारण परिस्थिति में किसी के लिए अपने सर्वस्व को त्याग देने का ही नाम दान है। अन्यथा चंदन की लकड़ी के खिड़की-द्वार तो आपके महल में भी थे।

In English

When Maharaj Yudhishthur ruled the Indraprastha. They used to donate a lot of money. Gradually his fame began to spread as a charismo and Pandavas were proud of it. Once Krishna reached Indraprastha. Bhima and Arjuna began to admire Yudhisthira, how many great donors they are.

Then Krishna pushed him in the middle and said, ‘We did not listen to Danak and like Karna. Pandavas did not like it. Bheem finally asked, how? Krishna said that he will tell when the time is right.

Within a few days, the month of Sawan started and the rain started flowing. At that time an elfy came to Yudhishthira and said, Maharaj! I am a Brahmin living in your state and my fast is that without eating it, nothing will eat and drink. For many days I do not have sandal wood for yagya. If you have, please bless me, otherwise the havan will not be complete, I will die of hunger and thirst.

Yudhishthar immediately summoned the Treasury employee and ordered the sandalwood wood from the fund. Incidentally, there was no dry wood in the treasury. Then Maharaj ordered Bhima and Arjuna to arrange sandalwood. But quite a race – dry wood was not arranged even after sunlight. Then seeing Brahmin desperate, Krishna said, with my guess you can get wood in one place, come with me.

Brahmin’s eyes started glowing. God also pointed to Arjuna and Bhima, by changing the look, they too with the Brahmin. Krishna went to the Karn’s palace along with everyone. All Brahmins were in the trap, so Karna did not recognize them. The eloquent Brahmins went and repaired their own demand of wood. Karna also invited the head of his store to give dry wood, there also the same answer was received.

Brahmin was disappointed. Arjuna-Bhima begins to look after God with question-oriented eyes. But he kept sitting for his familiar smile. Suddenly Karna said, O God! Don’t be disappointed, I have a solution. He cut the sandalwood in his palace window and cut the heap, then asked Brahmin, please take the wood as much as you want, please. Karna sent his servant along with Brahmin for carrying wood.

Brahmin returned to the wood by taking wood and Karna. Pandavas and Shrikrishna also returned. After coming back, God said, donating in the ordinary state is not a special feature, but in the extraordinary circumstances, giving donations to all your desires is the name donation. Otherwise the sandalwood window window was in your palace too.

 

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