Tuesday , 11 July 2017
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मनुष्य कर्म से बनता है महान

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मनुष्य कर्म से बनता है महान

मनुष्य कर्म से बनता है महान

स्वामी दयानंद का घर तब फर्रुखाबाद में था। एक दिन एक व्यक्ति एक थाली में दाल-भात परोसकर ले आया। वह व्यक्ति घर-गृहस्थीवाला था और मेहनत मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट भरता था। उच्च कुल का नहीं होने के बावजूद स्वामीजी ने जब उसके हाथ का अन्न ग्रहण किया, तो ब्राह्मणों को बुरा लगा।

नाराज होकर वे स्वामी जी से बोले, आपको इसका भोजन स्वीकार नहीं करना चाहिए था। इस हीन व्यक्ति का भोजन करने के कारण आप भ्रष्ट हो गए हैं। इस पर स्वामी जी ने हंसकर कहा, क्या आप लोग जानते हैं कि अन्न जल दूषित कैसे होता है?

लोगों द्वारा कोई जबाव नहीं दिए जाने पर उन्होंने कहा, नहीं जानते न, तो लीजिए में हीं बताता हूं। वह बोले, अन्न दो प्रकार के होते हैं। एक तो वह, जहां दूसरे को दुख देकर अन्न प्राप्त किया जाता है और दूसरा अन्न वह है जहां उसमें कोई मलिन या अभक्ष्य वस्तु पड़ जाती है।

मगर इस व्यक्ति का अन्न तो इन दोनों श्रेणियों में नहीं आता है। इस व्यक्ति द्वारा दिया गया अन्न परिश्रम से कमाए पैसे का है, तब यह दूषित कैसे हो सकता है। वास्तविकता तो यह है कि हमारा मन मलिन होता है और इस कारण हम दूसरों की चीजों को मलिन मानने लगे हैं, और ऐसा करने से हम और भी मलिन हो जाते हैं।

स्वामी जी ने आगे कहा, इसलिए हमें एक दूसरे के प्रति भेदभाव को त्यागकर अपने मन को दूषित होने से बचाना चाहिए। इसी में हमारा कल्याण है, हमारी भलाई है।

In English

Swami Dayanand’s house was then in Farrukhabad. One day a person came to serve a dish with lentils and rice. The person was a householder, and by doing hard work, he used to fill himself and his family. In spite of not being a high clan, when Swamiji assumed the food of his hand, then the Brahmins felt bad.

Being angry, he spoke to Swami Ji, you should not accept its food. Due to eating this inferior person you have become corrupt. Swamiji laughed at this and said, do you know how food is contaminated?

When no response was given by the people, they said, do not know, neither do I tell them. He said, there are two types of food. One, that is where food is obtained by hurting others and the second food is where there is no dirty or inedible thing in it.

But the food of this person does not come in these two categories. The food given by this person is money earned from diligence, then how can it be contaminated. The reality is that our mind is dull and because of this we have started to think of the things of others as morally, and by doing so, we become even more dull.

Swami ji said further, therefore, we should discard our mind from being contaminated by discarding discrimination against each other. This is our welfare, our goodness.

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