Sunday , 12 February 2017
Latest Happenings
Home » Gyan Ganga » God Leela » पलकों के झपकने के पीछे की कथा

पलकों के झपकने के पीछे की कथा

palakon-ke-jhapakane-ke-peechhe-kee-katha

palakon-ke-jhapakane-ke-peechhe-kee-katha

Ram

Ram

पुराणों में छोटी-छोटी बातों का भी वर्णन आता है. हम समय-समय पर इनसे जुड़ी कथाएं लेकर आते रहते हैं. आज मैं आपको हमारी पलकों के झपकने के पीछे की कथा लेकर आया हूं.
पलकें झपकने को लेकर देवी भागवत पुराण एवं अन्य पुराणों में एक कथा है. इस कथा का संबंध माता सीता के पूर्वजों से हैं. आज वह कथा सुनिए.
राजा इच्छवाकु के वंश में खटवांग हुए. खटवांग के पुत्र दीर्घबाहु, दीर्घबाहु के पुत्र रघु हुए. रघु के पुत्र अज और अज के पुत्र दशरथ हुए. दशरथ के पुत्र भगवान श्रीराम के रूप में स्वयं नारायण ने अवतार लिया.
आपको माता सीता के पिता राजा जनक के कुल की चर्चा की ओर लिए चलता हूं. उनके बारे में अपेक्षाकृत कम पता है लोगो को इसलिए जनक के कुल की कथा सुनते हैं.
राजा निमि के राज्य में अकाल और अनावृष्टि हुई तो प्रजा संकट में आ गई. निमि बड़े धर्मात्मा थे. उन्होंने इस आपदा का कारण जानने के लिए अपने गुरुजनों से परामर्श किया.
सबकी यही राय हुई कि राजा को राजसूय यज्ञ कराकर माता जगदंबा के साथ-साथ सभी देवों को प्रसन्न करना चाहिए. माता जगदंबा की कृपा तो उनपर है ही इसलिए यदि राजसूय यज्ञ में निष्ठ होकर वह जगदंबा का आह्वान करें तो संकटों से प्रजा की रक्षा हो जाएगी.
निमि ने यज्ञ का निश्चय किया और पिता की आज्ञा से यज्ञ की तैयारी भी आरंभ कर दी. उस समय भृगु, अंगिरा, वामदेव, गौतम, वशिष्ठ, पुलस्त्य, ऋचिक, पुलह और क्रतु जैसे श्रेष्ठ महर्षियों को आमंत्रित किया गया.
वशिष्ठ इनके कुल गुरू थे. सारी तैयारी पूरी करने के बाद निमि महर्षि वशिष्ठ के पास गए और उनसे मुख्य पुरोहित बनकर इस यज्ञ का कार्यभार ग्रहण करने का आग्रह किया.
निमि ने कहा- गुरूवर प्रजा बहुत कष्ट में है. इस कष्ट का अंत राजसी यज्ञ से ही होगा. आप कुलगुरू हैं. अतः विद्वान महर्षियों के साथ यज्ञ संपन्न कराएं ताकि प्रजा का कल्याण हो.
मैंने यज्ञ सामग्री तैयार कर ली है. अब पांच वर्ष के लिए दीक्षित होकर विधिपूर्वक यज्ञ करके माता जगदंबा की कृपा प्राप्त करना चाहता हूं.
वशिष्ठ निमि के विचारों से प्रसन्न थे. वशिष्ठ ने कहा-आपके विचार कल्याणकारी हैं किंतु इसमें एक बाधा है. आपसे पहले इंद्र ने मुझे अपने यज्ञ का पुरोहित बना लिया है. आप यज्ञ सामग्रियों को सुरक्षित रखें. मैं इंद्र का यज्ञ पूर्ण करते ही आपका यज्ञ आरंभ करुंगा.
निमि ने कहा- गुरुवर मैंने अन्य महर्षियों को भी निमंत्रित किया है. फिर यज्ञ सामग्री को इतने समय तक सुरक्षित रखना कैसे संभव होगा? आप कुलगुरू हैं इसलिए आप मेरे यज्ञ के लिए चलने की कृपा करे. इंद्र दूसरा आचार्य चुन सकते हैं.
वशिष्ठ ने बात टाल दी और यह कहते हुए चले गए कि इंद्र का यज्ञ पूरा कराकर वह शीघ्र आएंगे और यज्ञ आरंभ करेंगे. इंद्र का यज्ञ लंबा खिंचने लगा. कई वर्ष बीत गए. निमि और प्रतीक्षा करने की स्थिति में नहीं थे. सो उन्होंने गौतम को आचार्य बनाया और यज्ञ आरंभ किया.
इंद्र का यज्ञ अनेक वर्षों के बाद संपन्न हुआ. वशिष्ठ को ध्यान आया कि उन्हें निमि का यज्ञ भी कराना है. वह तत्काल चले. वहां पहुंचे तो पता चला कि गौतम को आचार्य बनाकर यज्ञ शुरू हुआ. वशिष्ठ क्रोधित हो गए.
उन्होंने शाप दिया- तुमने मुझे आचार्य बनने का न्योता देकर किसी अन्य से यज्ञ कराया. अपने गुरू का अपमान किया है तुमने. तुम्हारे लिए यह शरीर व्यर्थ है. तुम विदेह यानी बिना देह के हो जाओ.
जिस समय निमि को शाप मिला वह यज्ञ में दीक्षित थे. उनके ऋत्विज ब्राह्मणों ने आपस में परामर्श करके निमि के शरीर को मंत्रशक्ति के बल से सुरक्षित कर दिया. उनके शरीर से प्राण को निकलने नहीं दिया.
परमज्ञानी वशिष्ठ द्वारा शापित होने से निमि भी क्रोधित हुए. क्रोध में वह यहां तक सोच बैठे कि इंद्र की ओर से मिलने वाली दक्षिणा के लोभ में कुलगुरू होने के बाद भी मेरा यज्ञ ठुकराया और अब स्वयं मुझे विदेह करना चाहते हैं.
निमि ने कहा- मूर्खता से भरा आपका शरीर कल्याणकारी नहीं है. आप इस शरीर के अधिकारी नहीं हैं. इसलिए आपका भी शरीर क्षय हो जाएगा. निमि यज्ञ में दीक्षित तो थे ही साथ-साथ ही साथ पृथ्वी पर इंद्र के समान श्रेष्ठ थे. शाप खाली नहीं जा सकता था.
शापित होकर वशिष्ठ अपने पिता ब्रह्मदेव के पहुंचे. क्षय से पीड़ित शरीर का कष्ट सुनाकर शाप निवारण की युक्ति पूछी. ब्रह्माजी ने कहा कि वशिष्ठ को इस शरीर का त्याग करना होगा.
उन्हें मित्रावरूण और उर्वशी के संयोग से फिर से देह धारण करना पड़ेगा यानी जन्म लेना पड़ेगा. यह कथा बड़ी रोचक है और इसकी चर्चा आगे अवश्य करेंगे. वशिष्ठ का जन्म उर्वशी और मित्रावरूण से हुआ.
इघर निमि के यज्ञ समाप्त होने पर सभी देवता अपनी आहुति ग्रहण करने पधारे. निमि ने अशरीर होते हुए भी सबकी उत्तम स्तुति की. देवताओं ने प्रसन्न होकर निमि से कहा कि इस यज्ञ के फलस्वरूप उन्हें मानव या देवता का स्वरूप मिल सकता है. देवताओं ने उनसे इच्छा पूछी.
निमि की ओर से उनके ऋत्विज ऋषियों और प्रजा ने देवताओं से प्रार्थना की कि ऐसा प्रजापालक और उत्तम राजा बहुत सौभाग्य से प्राप्त होता है. इसलिए देवतागण राजा निमि का मानव शरीर वापस कर दें.
निमि ने कहा- हे देवताओं! इस शरीर के खो देने के डर में भरकर मैंने क्रोधवश देवतुल्य अपने गुरू को शाप दिया. अतः मुझे अब शरीरमोह से विरक्ति हो गई है. मैं देव या मानव शरीर की इच्छा नहीं रखता.
यदि आप मुझपर प्रसन्न होकर कोई वरदान देने को इच्छुक हैं तो मुझे यह वरदान दीजिए कि मैं अपनी प्रजा के नेत्रों में रहकर अशरीर होते हुए भी उसके सुख-दुख में सदैव भागी और प्रत्यक्ष रहूं.
देवताओं ने निमि से कहा- माता जगदंबिका से यह वरदान मांगे. वह स्वयं आपको वरदान देने की इच्छुक हैं. देवों ने निमि को जगदंबा की स्तुति का गुप्त स्तोत्र प्रदान किया. निमि ने जगदंबा की स्तुति की.
माता जगदंबा ने निमि को दर्शन दिए. निमि ने मांगा- मुझे ऐसा ज्ञान दें जिससे मैं अशरीर होते हुए सभी मोह-माया से मुक्त रहूं और प्रजा के नेत्रों में ठहर सकूं.
भगवती ने कहा- अभी तुम्हारा प्रारब्ध भोग पूर्ण नहीं हुआ है. तुम्हें मैं सभी चर और अचर प्राणियों के नेत्र में वास करने का अधिकार देती हूं. तुम पृथ्वी लोक पर आने वाले सभी जीवों में आंखों की पलक बनोगे.
तुम्हारे कारण ही प्राणियों को आंखों की पलक गिराने की शक्ति मिलेगी. देवतागण इससे मुक्त रहेंगे. इसलिए वे अनिमिष कहलाएंगे. देवी ने मुनियों को कहा कि निमि के शरीर के मंथन से एक दिव्य पुत्र पैदा होगा जो विदेह कुल का मान बढ़ाएगा.
निमि के बाद उनके भाई देवरात ने शासन संभाला. देवरात का प्रताप ऐसा था कि जिस पिनाक धनुष को महादेव ने सतीदाह के बाद देवताओं के वध के लिए उठा लिया था, क्रोध शांत पर होने पर वह धनुष महादेव ने देवताओं को भेंट कर दिया.
देवताओं को उस धनुष के सर्वोत्तम पात्र राजा देवरात लगे. इंद्र ने भगवान शिव का वह धनुष पिनाक उनके पास सुरक्षित रखने के लिए दिया था. इसी कुल में राजा जनक हुए, जिनकी पुत्री वैदेही से श्रीराम का विवाह हुआ. भगवान ने वही धनुष तोड़कर स्वयंवर जीता था.

wish4me in English

puraanon mein chhotee-chhotee baaton ka bhee varnan aata hai. ham samay-samay par inase judee kathaen lekar aate rahate hain. aaj main aapako hamaaree palakon ke jhapakane ke peechhe kee katha lekar aaya hoon.
palaken jhapakane ko lekar devee bhaagavat puraan evan any puraanon mein ek katha hai. is katha ka sambandh maata seeta ke poorvajon se hain. aaj vah katha sunie.
raaja ichchhavaaku ke vansh mein khatavaang hue. khatavaang ke putr deerghabaahu, deerghabaahu ke putr raghu hue. raghu ke putr aj aur aj ke putr dasharath hue. dasharath ke putr bhagavaan shreeraam ke roop mein svayan naaraayan ne avataar liya.
aapako maata seeta ke pita raaja janak ke kul kee charcha kee or lie chalata hoon. unake baare mein apekshaakrt kam pata hai logo ko isalie janak ke kul kee katha sunate hain.
raaja nimi ke raajy mein akaal aur anaavrshti huee to praja sankat mein aa gaee. nimi bade dharmaatma the. unhonne is aapada ka kaaran jaanane ke lie apane gurujanon se paraamarsh kiya.
sabakee yahee raay huee ki raaja ko raajasooy yagy karaakar maata jagadamba ke saath-saath sabhee devon ko prasann karana chaahie. maata jagadamba kee krpa to unapar hai hee isalie yadi raajasooy yagy mein nishth hokar vah jagadamba ka aahvaan karen to sankaton se praja kee raksha ho jaegee.
nimi ne yagy ka nishchay kiya aur pita kee aagya se yagy kee taiyaaree bhee aarambh kar dee. us samay bhrgu, angira, vaamadev, gautam, vashishth, pulasty, rchik, pulah aur kratu jaise shreshth maharshiyon ko aamantrit kiya gaya.
vashishth inake kul guroo the. saaree taiyaaree pooree karane ke baad nimi maharshi vashishth ke paas gae aur unase mukhy purohit banakar is yagy ka kaaryabhaar grahan karane ka aagrah kiya.
nimi ne kaha- guroovar praja bahut kasht mein hai. is kasht ka ant raajasee yagy se hee hoga. aap kulaguroo hain. atah vidvaan maharshiyon ke saath yagy sampann karaen taaki praja ka kalyaan ho.
mainne yagy saamagree taiyaar kar lee hai. ab paanch varsh ke lie deekshit hokar vidhipoorvak yagy karake maata jagadamba kee krpa praapt karana chaahata hoon.
vashishth nimi ke vichaaron se prasann the. vashishth ne kaha-aapake vichaar kalyaanakaaree hain kintu isamen ek baadha hai. aapase pahale indr ne mujhe apane yagy ka purohit bana liya hai. aap yagy saamagriyon ko surakshit rakhen. main indr ka yagy poorn karate hee aapaka yagy aarambh karunga.
nimi ne kaha- guruvar mainne any maharshiyon ko bhee nimantrit kiya hai. phir yagy saamagree ko itane samay tak surakshit rakhana kaise sambhav hoga? aap kulaguroo hain isalie aap mere yagy ke lie chalane kee krpa kare. indr doosara aachaary chun sakate hain.
vashishth ne baat taal dee aur yah kahate hue chale gae ki indr ka yagy poora karaakar vah sheeghr aaenge aur yagy aarambh karenge. indr ka yagy lamba khinchane laga. kaee varsh beet gae. nimi aur prateeksha karane kee sthiti mein nahin the. so unhonne gautam ko aachaary banaaya aur yagy aarambh kiya.
indr ka yagy anek varshon ke baad sampann hua. vashishth ko dhyaan aaya ki unhen nimi ka yagy bhee karaana hai. vah tatkaal chale. vahaan pahunche to pata chala ki gautam ko aachaary banaakar yagy shuroo hua. vashishth krodhit ho gae.
unhonne shaap diya- tumane mujhe aachaary banane ka nyota dekar kisee any se yagy karaaya. apane guroo ka apamaan kiya hai tumane. tumhaare lie yah shareer vyarth hai. tum videh yaanee bina deh ke ho jao.
jis samay nimi ko shaap mila vah yagy mein deekshit the. unake rtvij braahmanon ne aapas mein paraamarsh karake nimi ke shareer ko mantrashakti ke bal se surakshit kar diya. unake shareer se praan ko nikalane nahin diya.
paramagyaanee vashishth dvaara shaapit hone se nimi bhee krodhit hue. krodh mein vah yahaan tak soch baithe ki indr kee or se milane vaalee dakshina ke lobh mein kulaguroo hone ke baad bhee mera yagy thukaraaya aur ab svayan mujhe videh karana chaahate hain.
nimi ne kaha- moorkhata se bhara aapaka shareer kalyaanakaaree nahin hai. aap is shareer ke adhikaaree nahin hain. isalie aapaka bhee shareer kshay ho jaega. nimi yagy mein deekshit to the hee saath-saath hee saath prthvee par indr ke samaan shreshth the. shaap khaalee nahin ja sakata tha.
shaapit hokar vashishth apane pita brahmadev ke pahunche. kshay se peedit shareer ka kasht sunaakar shaap nivaaran kee yukti poochhee. brahmaajee ne kaha ki vashishth ko is shareer ka tyaag karana hoga.
unhen mitraavaroon aur urvashee ke sanyog se phir se deh dhaaran karana padega yaanee janm lena padega. yah katha badee rochak hai aur isakee charcha aage avashy karenge. vashishth ka janm urvashee aur mitraavaroon se hua.
ighar nimi ke yagy samaapt hone par sabhee devata apanee aahuti grahan karane padhaare. nimi ne ashareer hote hue bhee sabakee uttam stuti kee. devataon ne prasann hokar nimi se kaha ki is yagy ke phalasvaroop unhen maanav ya devata ka svaroop mil sakata hai. devataon ne unase ichchha poochhee.
nimi kee or se unake rtvij rshiyon aur praja ne devataon se praarthana kee ki aisa prajaapaalak aur uttam raaja bahut saubhaagy se praapt hota hai. isalie devataagan raaja nimi ka maanav shareer vaapas kar den.
nimi ne kaha- he devataon! is shareer ke kho dene ke dar mein bharakar mainne krodhavash devatuly apane guroo ko shaap diya. atah mujhe ab shareeramoh se virakti ho gaee hai. main dev ya maanav shareer kee ichchha nahin rakhata.
yadi aap mujhapar prasann hokar koee varadaan dene ko ichchhuk hain to mujhe yah varadaan deejie ki main apanee praja ke netron mein rahakar ashareer hote hue bhee usake sukh-dukh mein sadaiv bhaagee aur pratyaksh rahoon.
devataon ne nimi se kaha- maata jagadambika se yah varadaan maange. vah svayan aapako varadaan dene kee ichchhuk hain. devon ne nimi ko jagadamba kee stuti ka gupt stotr pradaan kiya. nimi ne jagadamba kee stuti kee.
maata jagadamba ne nimi ko darshan die. nimi ne maanga- mujhe aisa gyaan den jisase main ashareer hote hue sabhee moh-maaya se mukt rahoon aur praja ke netron mein thahar sakoon.
bhagavatee ne kaha- abhee tumhaara praarabdh bhog poorn nahin hua hai. tumhen main sabhee char aur achar praaniyon ke netr mein vaas karane ka adhikaar detee hoon. tum prthvee lok par aane vaale sabhee jeevon mein aankhon kee palak banoge.
tumhaare kaaran hee praaniyon ko aankhon kee palak giraane kee shakti milegee. devataagan isase mukt rahenge. isalie ve animish kahalaenge. devee ne muniyon ko kaha ki nimi ke shareer ke manthan se ek divy putr paida hoga jo videh kul ka maan badhaega.
nimi ke baad unake bhaee devaraat ne shaasan sambhaala. devaraat ka prataap aisa tha ki jis pinaak dhanush ko mahaadev ne sateedaah ke baad devataon ke vadh ke lie utha liya tha, krodh shaant par hone par vah dhanush mahaadev ne devataon ko bhent kar diya.
devataon ko us dhanush ke sarvottam paatr raaja devaraat lage. indr ne bhagavaan shiv ka vah dhanush pinaak unake paas surakshit rakhane ke lie diya tha. isee kul mein raaja janak hue, jinakee putree vaidehee se shreeraam ka vivaah hua. bhagavaan ne vahee dhanush todakar svayanvar jeeta tha

Comments

comments