Wednesday , 5 July 2017
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एक रूपये की कीमत

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                                                                       एक रूपये की कीमत

बहुत समय पहले की बात है, सुब्रोतो लगभग 20 साल का एक लड़का था और कलकत्ता की एक कॉलोनी में रहता था।

उसके पिताजी एक भट्टी चलाते थे जिसमे वे दूध को पका-पका कर खोया बनाने का काम करते थे।

सुब्रोतो वैसे तो एक अच्छा लड़का था लेकिन उसमे फिजूलखर्ची की एक बुरी आदत थी। वो अक्सर पिताजी से पैसा माँगा करता और उसे खाने-पीने या सिनेमा देखने में खर्च कर देता।

एक दिन पिताजी ने सुब्रोतो को बुलाया और बोले, “देखो बेटा, अब तुम बड़े हो गए हो और तुम्हे अपनी जिम्मेदारियां समझनी चाहियें। जो आये दिन तुम मुझसे पैसे मांगते रहते हो और उसे इधर-उधर उड़ाते हो ये अच्छी बात नहीं है।”

क्या पिताजी! कौन सा मैं आपसे हज़ार रुपये ले लेता हूँ… चंद पैसों के लिए आप मुझे इतना बड़ा लेक्चर दे रहे हैं..इतने से पैसे तो मैं जब चाहूँ आपको लौटा सकता हूँ।”, सुब्रोतो नाराज होते हुए बोला।

सुब्रोतो की बात सुनकर पिताजी क्रोधित हो गए, पर वो समझ चुके थे की डांटने-फटकारने से कोई बात नहीं बनेगी। इसलिए उन्होंने कहा, “ ये तो बहुत अच्छी बात है…ऐसा करो कि तुम मुझे ज्यादा नहीं बस एक रूपये रोज लाकर दे दिया करो।”

सुब्रोतो मुस्कुराया और खुद को जीता हुआ महसूस कर वहां से चला गया।

अगले दिन सुब्रोतो जब शाम को पिताजी के पास पहुंचा तो वे उसे देखते ही बोले, “ बेटा, लाओ मेरे 1 रुपये।”

उनकी बात सुनकर सुब्रोतो जरा घबराया और जल्दी से अपनी दादी माँ से एक रुपये लेकर लौटा।

लीजिये पिताजी ले आया मैं आपके एक रुपये!”, और ऐसा कहते हुए उसने सिक्का पिताजी के हाथ में थमा दिया।

उसे लेते ही पिताजी ने सिक्का भट्टी में फेंक दिया।

“ये क्या, आपने ऐसा क्यों किया?”, सुब्रोतो ने हैरानी से पूछा।

पिताजी बोले-

तुम्हे इससे क्या, तुम्हे तो बस 1 रुपये देने से मतलब होना चाहिए, फिर मैं चाहे उसका जो करूँ।

सुब्रोतो ने भी ज्यादा बहस नहीं की और वहां से चुपचाप चला गया।

अगले दिन जब पिताजी ने उससे 1 रुपया माँगा तो उसने अपनी माँ से पैसा मांग कर दे दिया…कई दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा वो रोज किसी दोस्त-यार या सम्बन्धी से पैसे लेकर पिताजी को देता और वो उसे भट्टी में फेंक देते।

फिर एक दिन ऐसा आया, जब हर कोई उसे पैसे देने से मना करने लगा। सुब्रोतो को चिंता होने लगी कि अब वो पिताजी को एक रुपये कहाँ से लाकर देगा।

शाम भी होने वाली थी, उसे कुछ समझ नही आ रहा था कि वो करे क्या! एक रुपया भी ना दे पाने की शर्मिंदगी वो उठाना नहीं चाहता था। तभी उसे एक अधेड़ उम्र का मजदूर दिखा जो किसी मुसाफिर को हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शे से लेकर कहीं जा रहा था।

“सुनो भैया, क्या तुम थोड़ी देर मुझे ये रिक्शा खींचने दोगे? उसके बदले में मैं तुमसे बस एक रुपये लूँगा”, सुब्रोतो ने रिक्शे वाले से कहा।

रिक्शा वाला बहुत थक चुका था, वह फ़ौरन तैयार हो गया।

सुब्रोतो रिक्शा खींचने लगा! ये काम उसने जितना सोचा था उससे कहीं कठिन था… थोड़ी दूर जाने में ही उसकी हथेलियों में छाले पड़ गए, पैर भी दुखने लगे! खैर किसी तरह से उसने अपना काम पूरा किया और बदले में ज़िन्दगी में पहली बार खुद से 1 रुपया कमाया।

आज बड़े गर्व के साथ वो पिताजी के पास पहुंचा और उनकी हथेली में 1 रुपये थमा दिए।

रोज की तरह पिताजी ने रूपये लेते ही उसे भट्टी में फेंकने के लिए हाथ बढाया।

“रुकिए पिताजी!”, सुब्रोतो पिताजी का हाथ थामते हुए बोला, “आप इसे नहीं फेंक सकते! ये मेरे मेहनत की कमाई है।”

और सुब्रोतो ने पूरा वाकया कह सुनाया।

पिताजी आगे बढे और अपने बेटे को गले से लगा लिया।

“देखो बेटा! इतने दिनों से मैं सिक्के आग की भट्टी में फेंक रहा था लकिन तुमने मुझे एक बार भी नहीं रोका पर आज जब तुमने अपनी मेहनत की कमाई को आग में जाते देखा तो एकदम से घबरा गए। ठीक इसी तरह जब तुम मेरी मेहनत की कमाई को बेकार की चीजों में उड़ाते हो तो मुझे भी इतना ही दर्द होता है, मैं भी घबरा जाता हूँ…इसलिए पैसे की कीमत को समझो चाहे वो तुम्हारे हों या किसी और के…कभी भी उसे फिजूलखर्ची में बर्वाद मत करो!”

सुब्रोतो पिताजी की बात समझ चुका था, उसने फौरन उनके चरण स्पर्श किये और अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांगी। आज वो एक रुपये की कीमत समझ चुका था और उसने मन ही मन संकल्प लिया कि अब वो कभी भी पैसों की बर्बादी नहीं करेगा।

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Long time ago, Subroto was a 20-year-old boy and lived in a colony of Calcutta.

His father used to run a furnace in which he used to cook milk and cook it.

Subroto was a good boy, but it was a bad habit of mischief. He often asked for money from Dad and spent it on eating or drinking or watching movies.

One day Dad summoned Subroto and said, “Son, now you have grown up and you should understand your responsibilities. On the day that you keep asking for money and throwing it around it is not a good thing. ”

What daddy! Which one I take from you thousands of rupees … for a few bucks you are giving me such a great lecture..that money can be returned to you whenever I want. “Subroto said getting angry.

Due to hearing Subroto, Dad became angry, but he had understood that no matter what the scolding, scolding will not happen. That is why he said, “It is a very good thing … do this so that you do not give me more than just one rupee every day.”

Subroto smiled and feeling himself won and went away from there.

The next day when Subroto came to father in the evening, they saw him and said, “Son, bring me 1 rupee.”

Upon hearing her, Subroto feared and quickly returned from her grandmother with a rupee.

Take your father, I brought you a rupee! “, And saying that he gave the coin in the hands of father.

As soon as he took him, the father threw it in the coin.

“What did you do, why did you do this?”, Subroto asked surprise.

Dad said,

What should you mean, you should mean just giving 1 rupee, then whatever I do, whatever I do.

Subroto did not even argue too much and went quietly from there.

The next day when Dad demanded a rupee from him, he gave money to his mother and demanded money from him … For many days, this cycle continued and he took the money from a friend or a relative and gave it to Dad and threw it into the furnace.

Then one day it came, when everyone started refusing to give him money. Subroto began to worry about where he would bring a buck to Dad.

Evening was going to happen, she could not understand what she did! He did not want to raise the embarrassment of not giving a single rupee. Then she saw a middle-aged worker who was moving from a rickshaw puller to some passenger.

“Listen brother, will you allow me to take this rickshaw for a while? In exchange, I’ll take just one rupee from you “, Subroto told the rickshaw.

The rickshaw was very tired, she got ready soon.

Subroto started pulling rickshaw! This work was harder than he thought … In the distance, his palms got barked, his legs started to hurt! Well in some way he completed his work and in return earned himself a rupee from his first time in life.

Today, with great pride, he reached Dad and gave Rs 1 in his palm.

As soon as the father took the rupee, he extended his hand to throw it in a furnace.

“Stop papa!”, Subroto paused his hand, saying, “You can not throw it! This is my hard earned earnings. ”

And Subroto told the whole sentence.

Dad stepped up and embraced his son.

“look son! For so many days, I was throwing coins in the fireplace, but you did not stop me once but today when you saw your hard earned earnings going into the fire, they were completely frightened. Likewise, when you throw my hard earned money into things worthless then I feel so much pain, I too get nervous … so understand the value of money whether it is yours or someone else’s … ever eaten it. Do not waste in! ”

Subroto had understood Dad’s point, he immediately touched his feet and apologized for his behavior. Today he had understood the value of one rupee and he resolved to mind that now he will never waste money.

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