Monday , 29 May 2017
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गुरु के प्रति सच्ची दक्षिणा यही है

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प्राचीनकाल के एक गुरु अपने आश्रम को लेकर बहुत चिंतित थे। गुरु वृद्ध हो चले थे और अब शेष जीवन हिमालय में ही बिताना चाहते थे, लेकिन उन्हें यह चिंता सताए जा रही थी कि मेरी जगह कौन योग्य उत्तराधिकारी हो, जो आश्रम को ठीक तरह से संचालित कर सके।
उस आश्रम में दो योग्य शिष्य थे और दोनों ही गुरु को प्रिय थे। दोनों को गुरु ने बुलाया और कहा- शिष्यों मैं तीर्थ पर जा रहा हूँ और गुरुदक्षिणा के रूप में तुमसे बस इतना ही माँगता हूँ कि यह दो मुट्ठी गेहूँ है। एक-एक मुट्ठी तुम दोनों अपने पास संभालकर रखो और जब मैं आऊँ तो मुझे यह दो मुठ्ठी गेहूँ वापस करना है। जो शिष्य मुझे अपने गेहूँ सुरक्षित वापस कर देगा, मैं उसे ही इस गुरुकुल का गुरु नियुक्त करूँगा। दोनों शिष्यों ने गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य रखा और गुरु को विदा किया।
एक शिष्य गुरु को भगवान मानता था। उसने तो गुरु के दिए हुए एक मुट्ठी गेहूँ को पुट्टल बाँधकर एक आलिए में सुरक्षित रख दिए और रोज उसकी पूजा करने लगा। दूसरा शिष्य जो गुरु को ज्ञान का देवता मानता था उसने उन एक मुट्ठी गेहूँ को ले जाकर गुरुकुल के पीछे खेत में बो दिए।
कुछ महीनों बाद जब गुरु आए तो उन्होंने जो शिष्य गुरु को भगवान मानता था उससे अपने एक मुट्ठी गेहूँ माँगे। उस शिष्य ने गुरु को ले जाकर आलिए में रखी गेहूँ की पुट्टल बताई जिसकी वह रोज पूजा करता था। गुरु ने देखा कि उस पुट्टल के गेहूँ सड़ चुके हैं और अब वे किसी काम के नहीं रहे। तब गुरु ने उस शिष्य को जो गुरु को ज्ञान का देवता मानता था उससे अपने गेहूँ दिखाने के लिए कहा। उसने गुरु को आश्रम के पीछे ले जाकर कहा- गुरुदेव यह लहलहाती जो फसल देख रहे हैं यही आपके एक मुट्ठी गेहूँ हैं और मुझे क्षमा करें कि जो गेहूँ आप दे गए थे वही गेहूँ मैं दे नहीं सकता।
लहलहाती फसल को देखकर गुरु का चित्त प्रसन्न हो गया और उन्होंने कहा जो शिष्य गुरु के ज्ञान को फैलाता है, बाँटता है वही श्रेष्ठ उत्तराधिकारी होने का पात्र है। मूलतः गुरु के प्रति सच्ची दक्षिणा यही है।

Hindi to english

A guru of ancient times was very worried about his ashram. The elders were old and now the rest of the life wanted to live in the Himalayas, but they were being worried about who was the rightful successor to me, who could operate the Ashram properly.
There were two qualified disciplines in that ashram and both were dear to the guru. The master called both of them and said- The disciples are going to the pilgrimage and just ask you as Gurudakshina that this two fists are wheat. Keep a handful of both of you holding a handful and when I come, I have to return these two handfuls of wheat. The disciple who will give me his wheat back safe, I will appoint him as the master of this Gurukul. Both disciples kept the command of the guru and gave it to the master.
One disciple was believed to be God. He made a handful of gurus from the Guru and kept it safe in the Aaliyas and worshiped him every day. The second disciple, who believed to be the god of wisdom, took a handful of wheat and sowed it in the fields behind Gurukul.
After a few months when the guru came, he asked for a handful of wheat from the disciple, which he believed to be God. The disciple took the master and told him a pot of wheat kept in the pot, which he used to worship every day. The master noticed that the chaplain’s wheat had rotated and now they are not of any use. Then the master asked the disciple who believed to be the god of wisdom, to show his wheat. He took the master behind the ashram and said, ‘Gurudev, this harvest is a crop that is a handful of wheat and I am sorry that I can not give the same wheat as the wheat you were given.
The master’s heart was pleased by seeing the blossoming crop and he said that the disciple spreads the knowledge of the guru, he is eligible to be the best successor. It is basically a true dakshina towards the master.
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