Monday , 18 September 2017
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श्रीकृष्ण जी की के सात विशेष विग्रह

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वृंदावन वह स्थान है, जहां भगवान श्रीकृष्ण ने बाललीलाएं की व अनेक राक्षसों का वध किया। यहां श्रीकृष्ण के विश्वप्रसिद्ध मंदिर भी हैं। आज हम आपको 7 ऐसी चमत्कारी श्रीकृष्ण प्रतिमाओं के बारे में बता रहे हैं, जिनका संबंध वृंदावन से है। इन 7 प्रतिमाओं में से 3 आज भी वृंदावन के मंदिरों में स्थापित हैं, वहीं 4 अन्य स्थानों पर प्रतिष्ठित हैं

गोविंद उन्होंने उसी स्थान पर छोटी सी कुटिया इस मूर्ति को स्थापित किया। इनके बाद रघुनाथ भट्ट गोस्वामी ने गोविंदजी की सेवा पूजा संभाली, उन्हीं के समय में आमेर नरेश मानसिंह ने गोविंदजी का भव्य मंदिर बनवाया। इस मंदिर में गोविंद जी 80 साल विराजे। औरंगजेब के शासनकाल में ब्रज पर हुए हमले के समय गोविंदजी को उनके भक्त जयपुर ले गए, तब से गोविंदजी जयपुर के राजकीय (महल) मंदिर में विराजमान हैं।

मदन मोहनजी, करौली यह मूर्ति अद्वैतप्रभु को वृंदावन में कालीदह के पास द्वादशादित्य टीले से प्राप्त हुई थी। उन्होंने सेवा-पूजा के लिए यह मूर्ति मथुरा के एक चतुर्वेदी परिवार को सौंप दी और चतुर्वेदी परिवार से मांगकर सनातन गोस्वामी ने वि.सं. 1590 (सन् 1533) में फिर से वृंदावन के उसी टीले पर स्थापित की। बाद में क्रमश: मुलतान के नमक व्यापारी रामदास कपूर और उड़ीसा के राजा ने यहां मदनमोहनजी का विशाल मंदिर बनवाया। मुगलिया आक्रमण के समय इन्हें भी भक्त जयपुर ले गए पर कालांतर में करौली के राजा गोपालसिंह ने अपने राजमहल के पास बड़ा सा मंदिर बनवाकर मदनमोहनजी की मूर्ति को स्थापित किया। तब से मदनमोहनजी करौली (राजस्थान) में ही दर्शन दे रहे हैं।

गोपीनाथजी, जयपुरश्रीकृष्ण की यह मूर्ति संत परमानंद भट्ट को यमुना किनारे वंशीवट पर मिली और उन्होंने इस प्रतिमा को निधिवन के पास विराजमान कर मधु गोस्वामी को इनकी सेवा पूजा सौंपी। बाद में रायसल राजपूतों ने यहां मंदिर बनवाया पर औरंगजेब के आक्रमण के दौरान इस प्रतिमा को भी जयपुर ले जाया गया, तब से गोपीनाथजी वहां पुरानी बस्ती स्थित गोपीनाथ मंदिर में विराजमान हैं।

जुगलकिशोर जी, पन्ना भगवान श्रीकृष्ण की यह मूर्ति हरिरामजी व्यास को वि.सं. 1620 की माघ शुक्ल एकादशी को वृंदावन के किशोरवन नामक स्थान पर मिली। व्यासजी ने उस प्रतिमा को वहीं प्रतिष्ठित किया। बाद में ओरछा के राजा मधुकर शाह ने किशोरवन के पास मंदिर बनवाया। यहां भगवान जुगलकिशोर अनेक वर्षों तक बिराजे पर मुगलिया हमले के समय जुगलकिशोरजी को उनके भक्त ओरछा के पास पन्ना ले गए। पन्ना (मध्य प्रदेश) में आज भी पुराने जुगलकिशोर मंदिर में दर्शन दे रहे हैं।

राधारमणजी, वृंदावन गोपाल भट्ट गोस्वामी को गंडक नदी में एक शालिग्राम मिला। वे उसे वृंदावन ले आए और केशीघाट के पास मंदिर में प्रतिष्ठित कर दिया। एक दिन किसी दर्शनार्थी ने कटाक्ष कर दिया कि चंदन लगाए शालिग्रामजी तो ऐसे लगते हैं मानो कढ़ी में बैगन पड़े हों। यह सुनकर गोस्वामीजी बहुत दुखी हुए पर सुबह होते ही शालिग्राम से राधारमण की दिव्य प्रतिमा प्रकट हो गई। यह दिन वि.सं. 1599 (सन् 1542) की वैशाख पूर्णिमा का था। वर्तमान मंदिर में इनकी प्रतिष्ठापना सं. 1884 में की गई।

उल्लेखनीय है कि मुगलिया हमलों के बावजूद यही एक मात्र ऐसी प्रतिमा है, जो वृंदावन से कहीं बाहर नहीं गई। इसे भक्तों ने वृंदावन में ही छुपाकर रखा। इनकी सबसे विशेष बात यह है कि जन्माष्टमी को जहां दुनिया के सभी कृष्ण मंदिरों में रात्रि बारह बजे उत्सव पूजा-अर्चना, आरती होती है, वहीं राधारमणजी का जन्म अभिषेक दोपहर बारह बजे होता है, मान्यता है ठाकुरजी सुकोमल होते हैं उन्हें रात्रि में जगाना ठीक नहीं।

राधाबल्लभजी, वृंदावन भगवान श्रीकृष्ण की यह सुंदर प्रतिमा हित हरिवंशजी को दहेज में मिली थी। उनका विवाह देवबंद से वृंदावन आते समय चटथावल गांव में आत्मदेव ब्राह्मण की बेटी से हुआ था। पहले वृंदावन के सेवाकुंज में (संवत् 1591) और बाद में सुंदरलाल भटनागर (कुछ लोग रहीम को यह श्रेय देते हैं) द्वारा बनवाए गए लाल पत्थर वाले पुराने मंदिर में राधाबल्लभजी प्रतिष्ठित हुए।

मुगलिया हमले के समय भक्त इन्हें कामा (राजस्थान) ले गए थे। वि.सं. 1842 में एक बार फिर भक्त इस प्रतिमा को वृंदावन ले आए और यहां नवनिर्मित मंदिर में प्रतिष्ठित किया, तब से राधाबल्लभजी की प्रतिमा यहीं विराजमान है।

बांकेबिहारीजी, वृंदावन मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी को स्वामी हरिदासजी की आराधना को साकार रूप देने के लिए बांकेबिहारीजी की प्रतिमा निधिवन में प्रकट हुई। स्वामीजी ने इस प्रतिमा को वहीं प्रतिष्ठित कर दिया। मुगलों के आक्रमण के समय भक्त इन्हें भरतपुर ले गए। वृंदावन के भरतपुर वाला बगीचा नाम के स्थान पर वि.सं. 1921 में मंदिर निर्माण होने पर बांकेबिहारी एक बार फिर वृंदावन में प्रतिष्ठित हुए, तब से यहीं भक्तों को दर्शन दे रहे हैं। बिहारीजी की प्रमुख विशेषता यह है कि यहां साल में केवल एक दिन (जन्माष्टमी के बाद भोर में) मंगला आरती होती है, जबकि वैष्णवी मंदिरों में यह नित्य सुबह मंगला आरती होने की परंपरा है।

श्री कृष्ण द्वारका में हमेशा श्री राधा रानी की महिमा का गान किया करते थे और इसीलिए उनकी रानिया स्वयं को असुरक्षित महसूस करके यही कहती थी की हमभी तोह आपको वैसे ही प्रेमकरती है जैसे की राधा रानी करती थी| श्यामसुंदर ने कहा हम कुछ समय प्रतीक्षा करते है ,स्वयं ज्ञात हो जाएगा | कुछ दिन बाद कृष्णा ने पेट में दर्द होने का कहा और जिसको सभी वैद्य ठीककरने में असफल रहे | इस पर उन्हों ने कहा अगर आप मेरे किसी भी एक भक्त के चरण धो कर जल लेके आओगे और मैं उसे पियूँगा तोह ठीक हो जाऊंगा | इस पर रानियों से अपने चरण अमृतदेने के लिए कहा गया | इस पर वे भय से काँप उठी और उन्हों ने मना कर दिया कहा की वे नरक में नहीं जाना चाहती|
नारद मुनि को व्रज में जा कर गोपियो से उनके चरण अमृत ले कर आने के लिया कहा गया| इस पर राधा रानी सहित सभी गोपियो ख़ुशी ख़ुशी देने के लिए मान गयी|

नारद मुनि ने कहा ऐसा करने पे आप सब नरक जाओगी| इस पर सभी ने कहा अगर ऐसा करने पे हमारे प्राण प्रियतम ठीक होते है तोह हम हज़ारो वर्ष तक ख़ुशी ख़ुशी नरक में रहने के लिएतैयार है|
इस पर सभी रानियों को मानना पड़ा की राधा रानी और सभी गोपियो का प्रेम उनसे बेहतर ( बढ़कर )और पवित्र था|
ब्रज की गोपियो की जय!
जय जय जय श्री राधे ।।

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Vrindavan is the place where Lord Shrikrishna used to fetch ballets and killed many monsters. There are also Sri Krishna’s world-famous temples. Today we are telling you about 7 such miraculous Srikrishna statues, which belong to Vrindavan. Of these 7 statues, 3 are still established in the temples of Vrindavan, while 4 other places are distinguished-

Govind Devjee, Jaipur
This idol of Lord Krishna to Roop Goswami is from Vrindavan’s Goma Tila. 1592 (1535). They installed this statue in the small cottage at the same place. After this Raghunath Bhatt Goswami took over the service of Govindaji, in his time, Ameer Naresh Mansingh constructed a magnificent temple of Govindaji. Govind ji 80 years in this temple During the reign of Aurangzeb, during the attack on Braj, Govindaji was taken to his devotee, Jaipur, since then Govindaji is in the palace (palace) temple of Jaipur.

Madan Mohanji, Karauli
This idol was acquired by Advaitaprabhu from Dvashashaditya mound near Kalidah in Vrindavan. He handed this statue to a Chaturvedi family of Mathura for service-worship and demanded from the Chaturvedi family Sanatan Goswami asked V. In 1590 (1533), he re-established on the same mound of Vrindavan. Subsequently, the Malatan salt trader Ramdas Kapoor and the king of Orissa built a huge temple of Madan Mohan ji here. During the Mughalia invasion, the devotees also took them to Jaipur, but in time, King Gopal Singh of Karauli established a statue of Madan Mohan ji by building a large temple near his palace. Since then, Madan Mohanji is presenting itself in Karauli (Rajasthan).

Gopinathji, Jaipur
This idol of Lord Krishna was found on the banks of the Yamuna along the river and he placed this statue near Nidhwan and served the service of Madhu Goswami. Later, Raisal Rajputs built a temple here but during this attack of Aurangzeb, this statue was also taken to Jaipur, since then Gopinathji is sitting in the Gopinath temple situated in the old settlement.

Jugal Kishore ji, Panna
This idol of Lord Shri Krishna is called Hariramji Vyas. Magh Shukla Ekadashi of 1620 found a place called Kishorvan in Vrindavan. Vyasji distinguished that statue there. Later, King Madhukar Shah of Orchha built a temple near Kishorvan. Here, Lord Jugal Kishore, on many occasions, took Mughlia’s attack on pigeon for a number of years and took Junkishishorji to his devotee Orchha near his devotee. Even today in Panna (Madhya Pradesh) you are presenting a glimpse into the old Jugalkishore temple.

Raidharanji, Vrindavan
Gopal Bhatt Goswami got a shaligram in Gandak river. They brought him to Vrindavan and distinguished him in the temple near Keeshighat. One day some observer took a look that the sandalwood shaligram ji would look like it was as if it was a lizard in Kadhi. Goswamiji was very sad when he heard this, but in the morning, the divine image of Radharamana was revealed from Shaligram. This day 1599 (1542) was of Vaishak Poornima. In the present temple, their installation no. Made in 1884

It is notable that despite the Mughalite attacks, this is the only statue that did not go out of Vrindavan. This devotees kept hiding in Vrindavan only. The most special thing about them is that Janmashtami, where all the Krishna temples of the world celebrate Puja-Archana, Aarti, at night at twelve o’clock, the birth of Radharam jan is Abhishek at twelve o’clock, It is believed that Thakurji is well-grounded, it is ok to wake him in the night No.

Radhaabalabhji, Vrindavan
This beautiful statue of Lord Krishna was found in Dowry by Hiti Harivanshi. His marriage took place from the Deoband in Vrindavan with the daughter of the self-styled Brahmin in Chatthawal village. Radha Babbagji was first distinguished in the Lal Patthi old temple built by Sunderlal Bhatnagar (some people give this credit to Rahim) in the service center of Vrindavan (consolidated 1591) and later Sundarlal Bhatnagar.

During the Mughalia attack, the devotees took them to Cama (Rajasthan). V.c. Once again in 1842, the devotee brought this statue to Vrindavan and reputed it in the newly built temple, since then the statue of RadhaBalabhaji is situated here.

Bankehihariji, Vrindavan
In order to make the worship of Swami Haridasji to Margashrish Shukla Panchami, the statue of Bankehihariji appeared in Nidhwan. Swamiji distinguished this statue right there. During the invasion of the Mughals, the devotees took them to Bharatpur. Vrindavan’s garden at Bharatpur in place of name V. On the construction of the temple in 1921, Bankeihari once again became prestigious in Vrindavan, since then it has been offering devotees to the devotees. The prominent feature of Biharis is that there is only one day (morning after Janmashtami) in Mangala Aarti, while in Vaishnavi temples it is a tradition of Mangala Aarti in the morning.

Shri Krishna always used to sing the glory of Shri Radha Rani in Dwarka and that’s why his queen felt herself insecure and said that we love you just as Radha used to be the queen. Shyamsundar said, “We wait for some time, we will get to know ourselves.” A few days later, Krishna called for pain in the stomach and was unable to recover all the physicians. They said that if you wash the feet of one of my devotees and bring water and I will drink it, then I will be cured. On this, the queens were asked to make their feet Amritdene. They shudder at this and they refused to say that they do not want to go to hell.
Going to Narada Muni to Vraj

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