Monday , 18 December 2017
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स्वामी विवेकानंद ने सुना वेश्या का गीत

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स्वामी विवेकानंद को विदेश जाने से पहले एक बार खेतड़ी (राजस्थान) जाना पड़ा क्योंकि वहां के महाराजा की कोई संतान नहीं थी और स्वामीजी के आशीर्वाद से पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई थी। इसी की खुशी में एक उत्सव मनाया जा रहा था। दरबार में कई सामंत, प्रजाजन और कलाकार उपस्थित थे।

कार्यक्रम के आखिरी में एक गणिका (वेश्या) अपना नृत्य औऱ गीत प्रस्तुत करने के लिए उपस्थित हुई। स्वामीजी तत्काल सभाग्रह से उठकर अपने कक्ष में चले गए। गणिका को यह अच्छा नहीं लगा और उसने मधुर कंठ से गीत गाया, ‘प्रभुजी मोरे अवगुण चित न धरो’।

स्वामीजी ने जब यह गीत सुना तो वे अपने कमरे से वापस सभाग्रह में आए और कार्यक्रम में उपस्थित रहे। स्वामीजी ने सोच, मैं वितराग संन्यासी हूं और मुझमें नारी और पुरुष के प्रति यह भेदबुद्धि नहीं होना चाहिए।

Hindi to English

Swami Vivekananda once had to go to Khetri (Rajasthan) before going abroad because there was no child of the Maharaja and the blessings of his wife were received from Swamiji. A festival was celebrated in the same happiness. Many feudalists, subjects and artists were present in the court.

At the end of the program, a hodgepodge (prostitute) appeared to present her dance and song. Swamiji got up immediately from the hall and went to his room. The ganika did not like it and she sang a song with a melodious voice, ‘Prabhuji Morey Avagun Chit Na Dharo’.

When Swamiji heard this song, he came back to his room from his room and was present in the program. Swamiji thought, I am a Vitarag sannyasi, and I should not have this distinction towards women and men.

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