Thursday , 13 July 2017
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बेंजी का बड़ा दिन

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बेंजी का बड़ा दिन

                                                 बेंजी का बड़ा दिन

बड़े दिन की पूर्व संध्या थी। गलियाँ और बाजार परियों की नगरी जैसे सजे हुए थे। बाजार में सब दुकानों पर लाल, नीली, हरी, पीली बत्तियाँ तारों की तरह टिमटिमा रही थीं। सभी दुकानें जगमगा रही थीं। उनमें सजाया हुआ बड़े दिन का सामान मन को लुभा रहा था।
वहाँ तीन दुकानें ऐसी थीं जो क्रिस्मस पेड़ बेच रहीं थीं। छोटे, बड़े सभी तरह के पेड़ थे। उनमें कुछ असली थे, कुछ बनावटी भी थे। ये पेड़ बड़े आकर्षक ढँग से सजे हुए थे। सब चाँदी और सोने के रिबनों, रंगीन चमकदार गेंदों से सजे झिलमिला रहे थे।

बेंजी एक दुकान के बाहर खड़ा होकर एक पेड़ को देखने लगा। उसने सोचा, ‘काश! किसी तरह मुझे यह पेड़ मिल जाये। सैमी और रूथ पेड़ पाकर कितनी खुश होंगी। फिर उनका यह सबसे बेहतर क्रिस्मस होगा।’ उसे ध्यान आया उस पेड़ का जो उसने सबसे बड़ी दुकान में देखा था। ‘मुझे वही खरीदना है’ यह सोचकर वह अन्दर गया। उसने मालिक से उस पेड़ की ओर इशारा करते हुए दाम पूछे। दुकान के मालिक मोटे और गंजे मि. अब्राहम ने पहले ऊपर से नीचे तक बेंजी को देखा। फिर बेंजी की कमीज के दाई ओर पर बने छेद को एकटक देखने लगा। उस पर पड़ती दुकानदार की नजर बेंजी से छिपी नहीं रही। उसने अपने दोनों हाथ कुछ इस मुद्रा में उठाए कि दाएँ हाथ के नीचे वह छेद दब गया। ‘वैसे भी।’ उसने सोचा, “मेरे पास पूरे अठ्ठाईस रूपये हैं। इससे क्या फर्क पड़ता है कि मेरी कमीज में एक छेद है’।

“यह पैंतीस रूपये का है। क्या तुम खरीदना चाहते हो?” दुकानदार के मुँह से यह बात सुनकर बेंजी का सारा विश्वास छिन्न-भिन्न हो गया। उसे यह अहसास हो गया था जो पेड़ उसे इतना पसन्द आया है उसे वह खरीद नहीं सकता है। ये अठ्ठाईस रूपये जो उसने पूरे सप्ताह नुक्कड़ के ढाबे पर कठिन परिश्रम करके कमाए थे वे काफी नहीं थे।

उसने घंटो तक सैंकड़ो ग्राहकों को भाग-भाग कर भोजन परोसा था। वह अपनी छोटी बहनों सैमी और रूथ के लिए पेड़ खरीदना चाहता था। वह तो समझ रहा था कि पेड़ पच्चीस रूपये में ही आ जाएगा। बाकी तीन रूपये उसे और सजाने में काम आएँगे।

“क्या कह रहे हैं, मि. अब्राहम, पिछली बार तो यह केवल पच्चीस रूपये का ही था,” बेंजी ने झिझकते हुए कहा।

“जरूर था। पिछले साल पच्चीस रूपये का ही था। पर तुम्हें मालूम है न तब से अब तक महँगाई कितनी बढ़ गई है। मेरी दुकान में कोई भी पेड़ पैंतीस रूपये से कम नहीं हैं।” मि. अब्राहम से कहा और पूछा, “जल्दी बोलो, तुम्हें लेना है या नहीं?”

दुकानदार की बात सुनकर बेंजी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। ‘ कितना कठोर आदमी है’ सोचते हुए वह खिन्न मन से बाहर निकल आया। अपनी परेशानी में दरवाजे के पास रखी रेत की बालटी से भी टकराते-टकराते बचा। जब दुकान में लोग उसके सारे पेड़ खरीद रहे हैं तो ऐसे में दुकानदार भला उसकी क्या परवाह करेगा। दुकान में भीड़ थी। माता-पिता और बच्चे आपस में चिल्लाकर बात कर रहे थे कि उन्हें कौन-सा पेड़ पसन्द है।

“अब मैं कहाँ से बाकी के सात रूपये लाऊँ” बेंजी ने सोचा। उसे दुख यह था कि इस बार उसके छोटे से घर में कोई पेड़ नहीं होगा। उसे अपनी बहनों का विचार भी परेशान कर रहा था। उसने उन्हें अब की बार बड़े दिन का पेड़ लाने और उसे खूब सजाने के लिए, पूर्ण विश्वास के साथ, सामान लाने का वायदा किया था। यदि वह पेड़ नहीं ले गया तो उनके मन पर क्या बीतेगी। बल्कि उसने तो अपने मित्रों को भी आज रात खाने पर आने का निमंत्रण दिया था। पेड़ के बिना वह क्या मुँह लेकर घर जाएगा, और क्या अपने मित्रों को दिखाएगा।

शहर के दूसरे छोर पर बेंजी का छोटा-सा दो कमरों का घर था। वहाँ ऐसी दुकानों और सजावट कहाँ थी। बेंजी उदास मन लिए जेब में हाथ डाले जूते से पत्थरों को ठोकर मरता हुआ इधर से उधर घूमने लगा। बाज़ार के एक सिरे पर एक आधी बनी हुई इमारत खड़ी थी। शाम होने के कारण वहाँ बहुत वीरानी छाई हुई थी। बेंजी थोड़ी देर के लिए एक रेत के टीले पर जा बैठा। ठंड के मारे वह काँप रहा था। फिर उठकर बाजार में आ गया। सोचा, दुबारा पूछे। हो सकता है उन्होंने दाम गलत बता दिये हों। पर तभी दिमाग ने झटका दिया कि नहीं। वास्तव में सबसे छोटे पेड़ का मूल्य पैंतीस रूपये ही था।

‘बस सात ही रूपये तो कम थे। मैंने क्यों नहीं पिछले हफ्ते और सात रूपये कमा लिये? और दो-चार दिन ढाबे में ज्यादा काम कर लेता तो कमा ही लेता। इसी तरह अपने ऊपर झल्लाते, पैर पटकते, उसने फिर अपने आपको उसी दुकान के सामने खड़े पाया। उसने खिड़की में से देखा, वह पेड़ अभी तक वहीं खड़ा था।

अचानक, उसने मिस्टर अब्राहम को दुकान से बाहर आते हुए देखा। वह अपने दोनों हाथ खुशी से मल रहे थे और काफी सन्तुष्ट लग रहे थे। वह दुकान के बाहर खड़े होकर लोगों को आते-जाते हुए देखने लगे।

जैसे ही बेंजी ने उधर देखा, दुकान के ऊपर लगा बड़ा निऑन साईन बोर्ड जो हरे और लाल रंग में टिमटिमा, टिमटिमा कर कह रहा था ‘पेड़ बिक्री के लिए’ वह धीरे-धीरे नीचे सरक रहा है। बेंजी ने आव देखा न ताव, उछल कर मिस्टर अब्राहम को धक्का दिया और उन्हें पीछे की ओर धकेल दिया। इस गुत्थम-गुत्था में दोनों जमीन पर लोटपोट हो गए। तभी वह बोर्ड धड़ाम से गिरा और टुकड़े-टुकड़े हो बिखर गया।

“क्या हुआ क्या ? दुकानदार एकदम घबरा गया था।

“ओह,” बेंजी चिल्लाया, “तारों में से चिन्गारी निकल रही है।” जैसे ही वह कूदा तार एक गत्ते के डिब्बे से छू गये जो वहीं पड़े थे और तुरंत ही आग भड़क उठी। “ओह, ओह, आग! आग,” सहमे से मि. अब्राहम चिल्लाये। वह अभी तक जमीन पर बैठे थे।

‘आग’ शब्द सुनते ही कुछ ही क्षणों में भीड़ एकत्रित हो गई। बेंजी एक झटके से उठा। उसे दुकान के पास रखी रेत की बालटी का ध्यान आया। वही बालटी जिससे वह पहले भी टकराया था। उसने बालटी की रेत आग पर फेंकनी शुरू कर दी और लोगों ने भी ऐसी ही बालटियाँ उठा लीं। कई लोग चिल्ला भी रहे थे कि “आग बुझाने वालों को बुलाओ।” इतनी भागदौड़ और गड़बड़ी के बाद खतरा टल गया। लोग उत्तेजित होकर बात कर रहे थे। किसी की आवाज सुनाई पड़ी, “यह वही लड़का है जिसने मिस्टर अब्राहम की जान बचाई। कितना चतुर है यह।” इशारा बेंजी की ओर था।

“और आग बुझाने में भी इसने कितनी फुर्ती से काम लिया, ” किसी दूसरे ने कहा।

सारी बात सुन समझ कर मिस्टर अब्राहम भी मन ही मन बेंजी का गुणगान कर रहे थे।

भारी मन से उन्होंने बेंजी का कंधा दबा दिया। बोले, “मैं तुम्हारा किस तरह से धन्यवाद करूँ। तुमने आज मेरी जान बचाई है।”

“नहीं, नहीं, ऐसा न कहिए मिस्टर अब्राहम, आप सुरक्षित है यही मेरे लिए बहुत खुशी की बात है।” वह कुछ-कुछ शर्मिन्दा महसूस कर रहा था। “अब मुझे घर जाने की अनुमति दे,” वह मुड़ने ही लगा था कि मि. अब्राहम ने शांत स्वर में कहा, “मुझे याद है, तुम कुछ घंटे पहले यहाँ आये थे।” जो पेड़ बेंजी लेना चाहता था उसी की ओर इशारा करते हुए उन्होंने पूछा, “तुम यही पेड़ लेना चाहते थे न?” बेंजी चुप था। “मैं तुम्हें यह पेड़ उपहार स्वरूप देना चाहता हूँ। देखो इसे स्वीकार कर लो। इससे मुझे बहुत खुशी होगी।”

बेंजी को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। अपने शरीर पर उसने दो-तीन जगह चिकोटी काट कर देखा कि वह सपना तो नहीं देख रहा था। उसकी आँखों में चमक आ गई। “धन्यवाद सर, पर आप को यह पैसे अवश्य लेने पड़ेंगे और बाकी पैसे मैं कुछ ही दिनों मे लौटा दूँगा।”

“नहीं, नहीं पैसे की बात करके तुम मुझे शर्मिन्दा मत करो, “मि. अब्राहम ने कहा। “मैं तुम्हें इसे उपहार के रूप में देना चाहता हूँ। मैं जानता हूँ मेरी जान बचाने के बदले यह कुछ भी नहीं है, पर क्योंकि तुम्हें यह पसन्द आया था इसीलिए, ” कहते-कहते वह रूक गए।

“ओह धन्यवाद सर, मेरी छोटी बहनें बहुत खुश होंगी। मैंने उनको आज रात पेड़ लाकर देने का वायदा किया था।”

“तब तो तुम्हें अवश्य ही उन्हें निराश नहीं करना चाहिए, “मि. अब्राहम ने मुस्कराते हुए कहा। “एक मिनट रूको,” कहते हुए वह अपनी दुकान के पीछे बने एक छोटे से कमरे में गायब हो गये। अगले ही क्षण वह अपने हाथ में एक गत्ते का डिब्बा लेकर वापस आये। “इसे भी पेड़ के साथ ले जाओ, इसमें कुछ सजावट का सामान है। और मेरी गाड़ी तुम्हें तुम्हारे घर तक छोड़ आयेगी। नहीं तो फिर कोई समस्या आ खड़ी होगी।”

बेंजी जब घर पहुँचा तो उसे लगा जो गली अभी कुछ घंटों पहले तक ठंडी व वीरान लग रही थी अब खुशियों से भर गई है। उसे लगा कि हरी और लाल बत्तियाँ उसके हृदय को छू रही हैं। पेड़ उतारने के बाद, बेंजी ने ड्राइवर को एक पल के लिए रूकने को कहा, “मैं मि. अब्राहम के लिए कुछ भेजना चाहता हूँ।” घर के अन्दर तेजी से जा कर बेंजी ने एक कागज पर कुछ लिखा और एक लिफाफे में डालकर उसे बंद कर दिया और मि. अब्राहम को देने के लिए ड्राइवर को दे दिया। फिर सुख की सांस ली।

उस रात जब अमर और राहुल चले गये, और उसकी दोनों बहनें शाम के उत्साह से भरी सो गई, तब बेंजी उस पेड़ को देखने लगा जिसका प्रकाश पूरे कमरे में फैल रहा था। इतनी सारी सजावट थी, सुनहरी और चांदी के रंग के काँच के गोले, लाल, नीली, हरी और पीली बत्तियाँ, रंग-बिरंगे रिबन। पर सबसे अच्छा तो उसे चमकीला सितारा लगा था जो उन्हें उस गत्ते के डिब्बे में मिला था। जब भी वह झिलमिलाता था तो लगता कह रहा हो, “मैं यहाँ खुश हूँ।”

जब मि. अब्राहम ने वह लिफाफा खोला तो उन्हें उसमें कुछ रूपये और एक पुर्जा मिला। “कृपया यह अठ्ठाईस रूपये स्वीकार कीजियेगा। पिछले साल पेड़ की यही कीमत थी। मैंने ज्यादा काम नहीं किया था, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। क्रिस्मस की बधाई।

Hindi to English

The big day was eve. The streets and the markets were decorated like a festive town. Red, blue, green, yellow lights on all the shops in the market were flickering like wires. All the shops were glowing. The big day’s stuff decorated in them was enticing the mind.

There were three shops that were selling Christmas trees. There were small, big trees of all kinds. Some of them were genuine, some were fake. These trees were decorated with a very attractive trunk. All the silver and gold ribbons were shimmering with colored shiny balls.

Benji stood outside a shop and looked at a tree. He thought, ‘Wish! Somehow I found this tree. How happy Sammy and Ruth will be after seeing the tree. Then this would be their best Christmas. ‘ He noticed that the tree that he had seen in the biggest shop. Thinking he has to buy the same thing he went in. He asked the owner of the price pointing towards that tree. Shop owner Fat and bald Mi. Abraham first saw Benji from top to bottom. Then, on the right side of Benji’s shirt, he saw the hole on the right side. The shopkeeper that falls on him is not hidden from Benji. He raised his both hands in this pose that the hole was buried under the right hand. ‘otherwise also.’ He thought, “I have eighteen rupees in my hand, so what difference does it make that there is a hole in my shirt?”

“It’s thirty five rupees. Do you want to buy?” By listening to this from the shopkeeper’s mouth, the whole of Benji’s faith was disintegrated. She had realized that the tree she loved so she could not buy it. This eighty rupees which he had earned through hard work on the street of the Nook was not enough.

He served hundreds of hours and served food to the customers. She wanted to buy a tree for her small sisters Sammy and Ruth. He understood that the tree would come in twenty five rupees. The remaining three will be used to decorate it and decorate it.

“What are you saying, Mr. Abraham, the last time it was only twenty five rupees,” said Benji, hesitating.

“Of course, last year was about twenty-five rupees but you know, how far the price has increased so far since no one in my shop is less than thirty-five rupees.” Min Asked Abraham and asked, “Speak quickly, do you have to take or not?”

Benji’s face became red with shame after listening to the shopkeeper. Thinking of ‘how hard the man is,’ he got out of the sad heart. In their trouble, they also collided with the sand bucket kept near the door. When people are purchasing all the trees in the shop, then what will the shopkeeper care about her? The shop was crowded. Parents and children were shouting among themselves what kind of tree they liked.

“Now where do I bring seven rupees from the rest” Benji thought. The misery was that this time there will be no tree in her little house. He was troubling the idea of ​​his sisters too. He promised to bring them the big day’s tree and decorate it for a lot of time, with full confidence, to bring the goods. If he did not take the tree then what would have happened to his mind? Rather he even invited his friends to come to dinner tonight. Without the tree, he will take home with his mouth, and show it to his friends.

On the other side of the city, Benji had a small house of two rooms. Where were the shops and decorations there? Benji began to roam around in the pocket for a sad mind, stopping the stones from his shoes, and walking around. There was a half-built building at one end of the market. Due to the evening there was a lot of desolation. Benji sits on a sand dune for a while. He was shivering with cold. Then got up and came into the market. Thought, Confirm Maybe they have given the price incorrectly. But only then did the brain shock or not? In fact, the smallest tree was worth thirty-five rupees.

‘Just seven rupees were less then. Why did not I earn last week and seven rupees? If he did more work in the Dhabab for two-four days then he would have earned it. Likewise, he used to shake his legs, rolling his legs, he again found himself standing in front of the same shop. He saw in the window, that tree was still standing there.

Suddenly, he saw Mr. Abraham coming out of the shop. He used to wash his hands with pleasure and looked quite satisfied. He stood outside the shop and saw people coming and going.

As soon as Benji saw it, a large neon sign board on the shop that was flickering in green and red with flickering, saying ‘tree for sale’ he is slowly sliding down. Benji jumped up, tried to jump, pushed Mr. Abraham up and pushed him backwards. Both of these plots were plotted on the ground. At that time the board dropped from the clutter and the pieces were split.

“What happened? The shopkeeper was very nervous.

“Oh,” Benji shouted, “Chingari is coming out of the stars.” As soon as the curved touches touched a carton that fell on it and immediately the fire broke out. “Oh, oh, fire! Fire,” sighly, Mr. Abraham Shout He was sitting on the ground yet.

The crowd gathered in a few moments after listening to the word ‘fire’. Benji woke up with a shock. She got the attention of the sand bucket kept near the shop. The same bucket that he had even hit before. He started throwing the sand of the bucket on fire and people also picked up similar hairs. Many people were shouting that “call the fire extinguisher.” After so much disturbance and disturbance, the danger was upheld. People were talking excitedly. Someone’s voice was heard, “This is the same boy who saved Mr. Abraham’s life.

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