Monday , 3 July 2017
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हतोत्साहित मन होता है पराजय की पहली सीढ़ी

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हतोत्साहित मन होता है पराजय की पहली सीढ़ी

हतोत्साहित मन होता है पराजय की पहली सीढ़ी

महाभारत का युद्ध चल रहा था। एक ओर अर्जुन थे, जिनके सारथी थे ‘श्री कृष्ण’। तो दूसरी ओर कर्ण थे और उनका सारथी ‘शल्य’। भगवान श्री कृष्ण ने कर्ण के सारथी से कहा- ‘तुम हमारे विरुद्ध जरूर लड़ना पर मेरी एक बात जरूर मानना।’

जब कर्ण प्रहार करे तब कहना कि, ‘यह भी कोई प्रहार होता है, तुम प्रहार करना नहीं जानते।’ बस तुम इन वाक्यों को दोहराते रहना। सारथी शल्य ने कृष्ण की बात स्वीकार कर ली। युद्ध आरंभ हुआ। कर्ण के प्रत्येक प्रहार पर शल्य कहता, ‘यह भी कोई प्रहार है? आप प्रहार करना ही नहीं जानते।’
उधर, अर्जुन के प्रत्येक प्रहार पर, कृष्ण कहते, ‘वाह कैसा प्रहार है। क्या निशाना साधा है। प्रत्येक बार उसके सारथी द्वारा कहने पर कर्ण हतोत्साहित हो गया।’ अर्जुन की शक्ति बढ़ती गई और पांडव पहले से अधिक शक्तिशाली हो गए। इसीलिए प्रोत्साहन मन के लिए अमृत है जबकि हतोत्साहित मन पराजय की पहली सीढ़ी है।

In English

The war of was going on. On one side were Arjuna, whose charioteers were ‘Sri Krishna’ On the other hand, Karna and his charioteer ‘Saliya’ Lord Krishna said to Karnal charioteer: “You definitely must fight against me but I have to accept one thing.”

When the curse strikes, say, ‘This is also a blow, you do not know how to strike’. Just keep repeating these sentences. Sarathi Shalya accepted the word of Krishna. The war started. On every strike of the ear, the surgeon said, ‘Is this also a blow? You do not know how to strike. ‘
On each and every attack of Arjuna, Krishna says, “Wow what a blow is. What is the target? Karna was discouraged every time he was told by his charioteer. ‘ Arjun’s power grew and Pandavas became more powerful than before. That is why the promotion is nectar for the mind while the discouraged mind is the first ladder of defeat.

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