Monday , 18 December 2017
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यह है आत्मा का भोजन

this-is-the-souls-food

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बात उस समय की है जब महात्मा गांधी वकालत करते थे। वह नियमित प्रार्थना में हिस्सा लेते थे। एक बार एक वकील ने उनसे पूछा, आप प्रार्थना में जितना समय व्यतीत करते हैं, अगर उतना ही समय देश की सेवा में लगाया होता, तो आप अभी तक देश की कितनी सेवा कर चुके होते।

गांधीजी ने गंभीर हो गए और बोले, वकील साहब! आप भोजन करने में कितना समय बर्बाद करते हैं। यदि वही समय कामकाज में लगाया होता तो अभी तक आपने अनेक अतिरिक्त मुकदमों की तैयारी कर ली होती।

वकील अचंभे में पढ़ गया। वह बोला, गांधीजी यदि भोजन नहीं करेंगे तो काम कैसे होगा। तब गांधीजी ने कहा, जैसे आप बिना भोजन के मुकदमे की तैयारी नहीं कर सकते, वैसे ही मैं प्रार्थना के बिना देश की सेवा नहीं कर सकता। प्रार्थना मेरी आत्मा का भोजन है। इससे मेरी आत्मा को शक्ति मिलती है, जिससे मैं देश की सेवा कर सकता हूं।

Hindi to English

The talk is about the time Mahatma Gandhi used to advocate. He used to participate in regular prayer. Once a lawyer asked him, if you spend the time in prayer, if you had spent the same time serving the country, how much service you have had till now.

Gandhiji became serious and said, lawyer! How much time do you waste eating? If the same time had been put into work, then you had already prepared many additional lawsuits.

The lawyer went to the daze. He said, if Gandhiji does not eat food then how will it work? Then Gandhiji said, just as you can not prepare a case without food, so can not serve the country without praying. Prayer is the food of my soul. This gives strength to my soul, from which I can serve the country.

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