Wednesday , 12 July 2017
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आगे जाना है तो अपनाएं सहनशीलता

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आगे जाना है तो अपनाएं सहनशीलता

आगे जाना है तो अपनाएं सहनशीलता

एक बार सरयूदास रेलगाड़ी से कहीं जा रहे थे। गाड़ी में भारी भीड़ थी। कहीं तिल रखने का स्नान भी नहीं था। संतजी के पास ही एक मजबूत कद काठी का व्यक्ति बैठा था।

वह बार-बार संत की ओर पैर बढ़ाकर ठोकर मार देता था। संत सरयूदास ने बड़े दयाभाव से कहा, ‘भाई संकोच मत करना। लगता है तुम्हारे पैर में कहीं पीड़ा है और उस पीड़ा को दिखाने के लिए तुम बार-बार अपना पैर मेरी ओर बढ़ाते हो, मगर फिर वापस खींच लेते हो, मुझे कम से कम सेवा का मौका तो दो। मुझे तुम अपना ही समझो।’

संत ने उसका पैर उठाकर अपनी गोद में रख लिए और उसे सहलाने लगे। वह यात्री शर्मिन्दा हुआ और क्षमा याचना करते हुए कहने लगा, ‘महराज मेरा अपराध क्षमा करें। आप महात्मा हैं। यह बात मुझे अब पता चली है।’

In English

Once, Sirius was going somewhere from the train. There was a huge crowd in the car. There was not even a sesame bath. The person of a strong stick was sitting beside Saint Ji.

He repeatedly stabbed towards the saint and stabbed him. Saint Sirusudas said with great pity, ‘Brother, do not hesitate to do so. It seems like there is a pain in your feet, and to show that pain you increase your legs again and again, but then pull back, let me have the chance to serve at least. Treat me as your own. ‘

The saint raised his leg and kept it in his lap and began to caress him. The traveler became embarrassed and apologized, saying, ‘Maharaj, forgive my crime. You are a Mahatma. I know this thing now. ‘

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