Wednesday , 12 July 2017
Latest Happenings
Home » Education » रानी लक्ष्मीबाई ने किसे दिया था करारा जबाव

रानी लक्ष्मीबाई ने किसे दिया था करारा जबाव

who-gave-rani-laxmibai-the-contract

who-gave-rani-laxmibai-the-contract

रानी लक्ष्मीबाई ने किसे दिया था करारा जबाव

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई बेबाक अपनी बात रखती थीं। एक बार वह एक कथावाचक के यहां पहुंची। उस समय वहां कथा चल रही थी। वह बाल विधवा होने के बावजूद कांच की चूड़ियों की बजाए सोने की चूड़ियां पहने हुईं थीं।

उनके हाथों में चूड़ियों को देख, पंडित जी व्यंगात्मक लहजे में कहा, घोर कलयुग है। धर्म-कर्म की सारी मर्यादाएं टूट गईं हैं। विवाहित स्त्रियां पहले कांच की चूड़ियां पहनती थीं वो अब विधवा होने के बाद सोने की चूड़ियां पहन रही हैं।

जब यह बात कही गई, तब काफी लोग वहां मौजूद थे यह सुनकर लक्ष्मीबाई ने कहा, ‘महाराज! आप क्या जाने की हमने सोने की चूड़ियां क्यों पहन रखीं हैं। पति के जीते जी कांच की चूड़ियां इसलिए पहनती थीं ताकि हमारा सुहाग कांच की तरह नाशवान रहे। और जब उन्होंने शरीर त्याग दिया तब सोने की चूड़ियां इसलिए पहनती हैं ताकि हमारा सुहाग सोने की तरह चमकता रहे।’

वह पंडित लक्ष्मीबाई के इस उत्तर को सुनकर ठगा सा रह गया।

संक्षेप में, बिना कुछ जाने-समझे व्यंग्य करना कभी-कभी भारी भी पड़ सकता है। इसलिए व्यंग्य सोच-समझकर ही करना चाहिए।

Hindi to English

Rani Lakshmibai Babak of Jhansi used to keep her word. Once he reached here with a narrator. At that time the story was going on. Despite being a child widow, she was wearing gold bangles instead of glass bangles.

Seeing the bangles in their hands, Pandit said in a satirical tone, there is a fearful Kalyug. All the limitations of religion and deeds have been broken. Married women used to wear glass bangles first, they are now wearing gold bangles after getting a widow.

When this thing was said, Lakshmibai said, after hearing that many people were present there, ‘Maharaj! What do you know about why we wear gold bangles? Husband used to wear glass chunks so that our beauty could be destroyed like a glass. And when they give up the body, we wear gold bangles so that our suhag shines like gold. ‘

He was stunned to hear this reply of Pandit Laxmibai.

In short, doing satire without knowing anything can sometimes be overwhelming too. Therefore, satirical thinking should be done only by thinking.

Comments

comments