एक बूढ़ा सन्यासी था। अपने जीवन-यापन के लिए वह प्रतिदिन पास के गाँव में जाकर भिक्षा माँगता था। यद्यपि वह भिक्षा माँगकर पेट भरता था, परन्तु फिर भी अपना भोजन जरूरतमंदों के साथ अवश्य बाँटता था।
एक दिन वह एक वृद्धा के घर भिक्षा माँगने के लिए गया। उसने भिक्षा माँगी तो उस वृद्धा ने भोजन न होने का बहाना बनाकर उसे टाल दिया। अगले दिन एक बार फिर वह वृद्धा के घर भिक्षाटन के लिए गया।
यह देखकर वृद्धा बुरी तरह चिढ़ गई। उसने खाने में जहर मिलाकर सन्यासी को दे दिया। सन्यासी ने भोजन लिया और अपनी कुटिया में वापस आ गया। वह जैसे ही भोजन करने बैठा, तभी एक युवक उसके पास आया और बोला,
“मैं बहुत भूखा हूँ। कृपया मुझे खाने के लिए कुछ भोजन दे दो।” । सन्यासी ने पूरा भोजन उसे ही दे दिया। युवक ने जैसे ही भोजन खाया, उसे उल्टियाँ होने लगी और थोड़ी ही देर बाद वह मर गया। यह देखकर सन्यासी आश्चर्यचकित रह गया।
वास्तव में वह युवक और कोई नहीं उसी वृद्धा का इकलौता पुत्र था। इस प्रकार अपनी दुष्ट प्रवृत्ति के कारण उस वृद्धा ने अपने इकलौते पुत्र को खो दिया। किसी ने ठीक ही कहा है- जैसी करनी वैसी भरनी।
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