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मन बड़ा ही प्रबल है
मन बड़ा ही प्रबल है। जन्म-जन्मसे वासनाओंके संस्कार चित्तमें दबे पड़े हैं। कब कौन-सा दोष, कौन सी वासना भड़क उठेगी-इसका कुछ ठिकाना नहीं है। जो दोष अपनेमें ढूँढ़ने से भी नहीं जान पड़ते, वे ही समय पाकर इस प्रकार उभड़ पड़ते हैं कि मनुष्य उनका दास सा बन जाता है। सारे संयम, सब विचार धरे रह जाते हैं। अपने बलपर …
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