एक नगर में एक पंडित जी रहते थे। पंडित जी का स्वभाव बहुत ही सरल था। और उनको किसी भी चीज का लालच नहीं था। एक बार पंडित जी सुबह बच्चो को पढ़ाने जा रहे थे तो उनकी पत्नी बोली, “शाम के खाने के लिए बस एक मुट्ठी चावल है और कुछ नहीं।” पंडित जी बिना कुछ बोले ही निकल दिए।
पंडित जी जब शाम को घर वापस आए तो उनकी पत्नी ने उनको खाना खाने को दिया। इस पर पंडित जी बोला, “यह साग तो बहुत ही अच्छा है। तुमने कहाँ से लाया?” इस पर उनकी पत्नी बोली, “आज सुबह जब मैंने आपसे पूछा कि घर में बस एक मुट्ठी चावल है तब आपने इमली की पेड़ की तरफ जब देखा तभी मैं समझ गई थी और मैंने इमली का साग बनाया है। इस पर पंडित जी ने कहा, “अब तो हमको भोजन की कोई चिंता करने की जरुरत ही नहीं है।”
पंडित जी जिस नगर में रहते थे जब उस नगर के राजा को पंडित जी के गरीबी के बारे में पता चला तो राजा ने पंडित जी को अपने महल के पास आकर रहने का प्रस्ताव दिया। लेकिन पंडित जी ने मना कर दिया। इस पर राजा को बहुत अजीब सा लगा और वह खुद पंडित जी की छोटी सी कुटिया में मिलने के लिए पहुँच गया।
राजा जब पंडित जी की कुटिया में पहुँचा तो तो थोड़ी देर बात करने के बाद पूछा, “पंडित जी आपको कोई तकलीफ तो नहीं है?” इस पर पंडित जी ने बोला, “यह बात तो आप हमारे पत्नी से पूछ लीजिए।” फिर यही बात राजा ने उसकी पत्नी से पूछा तो पंडित जी की पत्नी ने बोला, “नहीं अभी तो मेरे कपडे फटे भी नहीं है और मटका भी नहीं टुटा और इमली का पेड़ भी है। इसलिए अभी हम लोगों को कोई भी परेशानी नहीं है। हम दोनों लोग बहुत ही कम चीजों में ही बहुत खुश रहते हैं।”
यह बात सुनकर राजा बहुत ही खुश हुआ और उन दोनों को प्रणाम करके अपने राज्य वापस चला गया।
इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है कि जीवन में खुश रहना सीखो, जरुरी नहीं है कि आपके पास राजमहल हो तभी आप खुश रह सकते हो।
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