एक बार, एक बुद्धिमान किसान था। उसका मोहन नाम का बेटा था जो अपने आप को सबसे होशियार समझता था। उसे दूसरों को सलाह देना बहुत अच्छा लगता था।
वह अपने पिता को भी खेती के बारे में सलाह देता था। लेकिन उसके पिता उस पर ध्यान नहीं देते थे। उनको, मोहन जैसे छोटे बच्चे का सलाह देना अभी सही नहीं लगता था।
वह हमेशा मोहन को समझाते हुए कहते-“जब तुम्हें मेरा जूता आने लगेगा, तब मैं तुम्हारी बात माना करूंगा। तब तुम मुझे बता सकोगे कि मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं।”
कुछ साल बाद मोहन जवान हो गया। लेकिन उसकी दूसरों को सलाह देने की आदत नहीं बदली। एक दिन उसके पिता ने देखा, उनके जूते और मोहन के जूते एक नाप के हो गए है।
अब उन्होंने मोहन को घर और खेत की सारी जिम्मेदारी सौंपने का फैसला कर लिया। अब मोहन जो तरीके दूसरों को बताया था, उस तरीके से वह खुद काम करने लगा था। मोहन के पिताजी अब खुश थे क्योंकि वह समझदार हो गया था।
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