विख्यात स्वतंत्रता सेनानी और साहित्यकार पंडित हरिभाऊ उपाध्याय के आमंत्रणपर लाला लाजपतरायजी 1927 में अजमेर पधारे। वहाँ राष्ट्रीय आंदोलन के संबंध में लालाजी का बड़ा प्रभावी भाषण हुआ।
हरिभाऊजी को उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय भावनाओं के प्रचार के लिए प्रकाशित पत्रिका का नाम त्यागभूमि की जगह कर्मभूमि होना चाहिए था। उन्होंने कहा कि त्याग और वैराग्य के उपदेश की जगह भगवान् श्रीकृष्ण के गीता के संदेश को अपनाने और निरंतर कर्म करते रहने की प्रेरणा देने की आवश्यकता है।
कुछ क्षण रुककर पंजाब केसरी लालाजी ने कहा, ‘हमने अपने देश का त्याग कर उसे विदेशियों को सौंप दिया । अपनी धन-दौलत उन्हें दे दी। त्याग के चक्कर में हमने अपने स्वर्ग समान राष्ट्र की बहुत हानि की है।
हमने श्रीकृष्ण के कर्म और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के संदेश को भुला दिया है। इसी का दुष्परिणाम है कि हम त्याग के नाम पर सबकुछ लुटाकर स्वयं बेबस बने विदेशी शासन का अत्याचार सहन कर रहे हैं।’ लालाजी के ओजपूर्ण शब्द सुनकर पंडित हरिभाऊजी नतमस्तक हो उठे।
लालाजी लाहौर में साइमन कमीशन के बहिष्कार जुलूस का नेतृत्व करते हुए पुलिस की लाठियों से घायल हुए। उन्होंने कहा था, ‘मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत की आखिरी कील साबित होगी।’ 17 नवंबर, 1928 को उन्होंने शरीर त्याग दिया और अमर हो गए।
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