घातक एक कल्ट क्लासिक रचना है… ऐसी फिल्म अब दोबारा से बन ही नहीं सकती…इस फिल्म को लोग ” ये मजदूर का हाथ है कात्या” जैसे डायलॉग की वजह से याद रखते हैं लेकिन ये फिल्म उससे कहीं अधिक है।
फिल्म के एक सीन में काशी का पिता अस्पताल में भर्ती होता है और उसे पता लगता है कि उसके पिता को कैंसर हो गया है और उसे ये बात अपने पिता से छुपानी होती है लेकिन काशी अपना दर्द छुपा नहीं पाता और अपने पिता के सामने रोने लगता है…ये सीन जितनी भी बार देखो हर बार इमोशनल कर देता है और साबित करता है सन्नी देओल भी उच्च लेवल के एक्टर हैं।
फिल्म के एक अन्य दृश्य में काशी का भाई काशी से कहता है कि मैं ये जगह छोड़कर गांव जा रहा हूं गांव में भी अपनी जमीन है… इसके जवाब में काशी कहता है कि कौनसी जमीं भैया?
बुजदिल की कही कोई जमीन नहीं होती…आज आप कात्या के डर से ये जगह छोड़ रहे हैं कल को गांव में कोई कात्या पैदा हो गया तो कहा जाओगे???
ये सीन भारतीय सिनेमा में ऐतिहासिक है… ऐसे डायलॉग वर्षों में एक दो बार ही लिखे जा सकते हैं… देखने वालों की रगों में भी ये सीन जोश भर देता है।
इस फिल्म से पहले अमरीश पुरी सैकड़ों फिल्मों में विलेन का रोल कर चुके थे लेकिन यहां पर उन्होंने एक रोगग्रस्त लाचार पिता की भुमिका निभाई थी… अपने बेटे काशी को बचाने के लिए वो कात्या के पैरों में जाकर गिर पड़े थे…ये सीन देखने में दर्दनाक था लेकिन इस सीन में अमरीश पुरी साहब ने अपनी अद्भुत अभिनय क्षमता का प्रदर्शन किया है।
अपने पिता और भाई की मौत के बाद तो जब जब काशी का मुकाबला कात्या और कात्या के भाईयों से होता है तब तब लगता ही नहीं कि हम कोई फिल्म देख रहे हैं…ऐसा लगता है कि ये कोई फिल्म ना चलकर कोई लाइव घटना चल रही है…ये राजकुमार संतोषी के उम्दा निर्देशन का कमाल था….लास्ट के कुछ दृश्यों में तो ऐसा लगता है कि सन्नी देओल सचमुच में ही इन लोगों को मार देगा… सन्नी देओल को घायल के लिए नेशनल अवार्ड मिला था लेकिन घातक फिल्म घायल से भी ज्यादा बेहतर फिल्म है… घातक जैसी रचनाएं रोज रोज नहीं होती… आजकल के बनावटी एक्शन दृश्यों वाली फिल्मों जिसमें हीरो ज़मीन पर पैर रखता है और गुंडे हवा में उड़ने लगते हैं उन सीनों से लाख गुना बेहतर थे घातक के एक्शन दृश्य।
Source: Unknown
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