ऎक बार एक व्यक्ति गोल्फ सीख रहा था…
वो जब भी अपनी स्टिक से बाॅल हिट करता…बाॅल उड़ती हुई होल/पिट से दस बारह मीटर दूर जाकर गिरती…
पर ऊसका कोच कहता…
”वेरी गुड…वेरी गुड…
बस एक दो mm का फर्क है…”
ट्रेनी बहुत हैरान…कन्फ्यूज…
ऎक बार…दो बार…तीन बार…
जब पाँच सात बार कोच ने एसा बोला…तो ट्रेनी बोल पड़ा…
”आपको क्या हुआ है कोच सर…क्या आप ठीक से देख नहीं पा रहे…???
बाॅल तो हर बार होल से आठ दस मीटर दूर गिर रही है…आसपास भी नहीं होल के…और आप कह रहे हैं बस एक दो mm का फर्क है…????
आपको पता भी लग रहा है आप क्या बोल रहे हैं…????”
अब कोच पहुँचे हुए गुरु थे…ध्यानी थे…धैर्यवान थे…
ऊन्होंने जवाब दिया…
”तुम अपनी जगह सही हो…तुम देख रहे हो कि बाॅल होल से कितनी दूर गिर रही है…
पर बेटा…मैं देख रहा हूँ तुम स्टिक से बाॅल पर चोट कहाँ कर रहे हो…
बस एक दो mm का फर्क है चोट में बेटा…वो ठीक कर लो…तो बाॅल सीधा होल में जाकर गिरेगी..”
इसी तरह…
अक्सर हम लोग उतावले पन में कोई काम करने के चक्कर में अपने एक्शन में जल्दबाजी कर देते हैं…तो ईस वजह से हमें ऊस ऎक्शन से desired परिणाम नहीं मिल पाता…
चोट करने…एक्शन लेने में लगाई महनत/पूँजी/ताकत व्यर्थ हो जाती है…
चाणक्य कहते हैं…
चोट करने…एक्शन लेने से पहले सही समय/जगह का चाक चौबन्ध ऒबजर्वेशन करके चुनाव कर लेना चाहिये…
सही समय…जगह मिलने तक धैर्य रखें…और प्राॅपर प्लानिंग/अभ्यास करते रहें…
वरना चोट में एक दो mm का फर्क रह गया तो बाॅल टार्गेट से कई मीटर दूर गिरेगी…
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