जाओ जाओ वृंदावन एह उधो
गोपियों से जाकर तुम मिलना
केहना कान्हा ने भेजा है
सुध उनकी जरा ले कर आना
उन्हें समझाना की अब न मुझको याद करे
इक छलियाँ के लिए वो वक़्त न बर्बाद करे
फिर वो क्या केहती है उनकी बात हमसे आकर तुम केहना,
केहना कान्हा ने भेजा है
कान्हा क्या जाने के प्यार क्या होता है
रोती हो तुम लोग वो चैन से सोता है
कभी आये गा मिलने तुम से वो,
इस धोखे में तुम मत रेहना,
केहना कान्हा ने भेजा है
मेरे लिए नफरत सीने में उनके भर डालो
बेवफा कान्हा है ये साबित तुम कर डालो,
परदेशी के प्रीत में पागल हो
क्यों देखती हो ऐसा सपना
जाओ जाओ वृंदावन एह उधो………..
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