एक बार की बात है। एक गांव में एक महान ऋषि रहता था। उस गांव के लोग उस ऋषि का बहुत ही सम्मान करते थे। गांव के सभी लोग जब भी कोई समस्या में होते तो वे ऋषि उस समस्या का हल जरूर बताते। सभी गांव वाले उस ऋषि से बहुत प्रशन थे। हर बार कोई नई समस्या लेकर उस ऋषि के पास आते और महान ऋषि उस समस्या का हल बतात्ते।
एक बार एक व्यक्ति उस ऋषि के पास एक सवाल लेकर आया और ऋषि से पूछा कि गुरू जी मैं एक प्रशन पूछना चाहता हूं। तो ऋषि ने कहा पूछो तुम्हारा क्या प्रशन है। तो वह व्यक्ति कहता है “मैं खुश कैसे रह सकता हूं मेरी ख़ुशी का राज क्या है?” तभी ऋषि ने जवाब दिया कि इसका जवाब पाने के लिए तुम्हे मेरे साथ जंगल में चलना होगा।
कुछ समय बाद वह व्यक्ति ख़ुशी का राज जानने के लिए ऋषि के साथ जंगल में जाने के लिए निकल लेता है और दोनों जंगल में जाते हैं। तभी रास्ते में एक बड़ा पत्थर आता है और ऋषि उस पत्थर को अपने साथ लेने के लिए उस व्यक्ति को कहते है। वह व्यक्ति ऋषि के आदेश को मानते हुए उस पत्थर को अपने हाथों में उठा लेता है।
कुछ समय बाद उस व्यक्ति को उस भरी पत्थर से हल्का दर्द होने लग जाता है। वह व्यक्ति इस दर्द को सहन कर लेता और चलता रहता है। काफी समय तक वह व्यक्ति उस दर्द को सहन कर लेता है। लेकिन जब उसे दर्द ज्यादा होने लगता है तो वह महान ऋषि से कहता है कि मुझे दर्द हो रहा है और मैं थक गया हूं।
तभी ऋषि कहते हैं कि इसे नीचे रख दो। वह व्यक्ति पत्थर को नीचे रखता है और उसे राहत मिलती है। फिर मुनि कहते हैं कि ये ही तुम्हारी ख़ुशी का राज है। वह व्यक्ति वापस पूछता है कि गुरू मैं कुछ समझा नहीं।
फिर ऋषि वापस उस व्यक्ति को जवाब देते हैं कि जिस तरह तुमने इस भारी पत्थर को 10 मिनिट के लिए उठाकर रखा तो तुम्हे थोड़ा दर्द हुआ। 20 मिनिट तक उठाया तो उससे ज्यादा और अधिक समय तक उठाकर रखा तो ज्यादा दर्द होने लगा। ठीक उसी प्रकार जितनी देर तक हम अपने पर दुखों का बोझ लिए फिरेंगे हमें ख़ुशी नहीं मिलेगी। निराशा ही मिलती रहेगी। हमारी ख़ुशी का राज सिर्फ इस पर निर्भर करता है कि हम कितनी देर तक दुखों का बोझ अपने ऊपर रखते हैं।
यदि तुम्हे अपने जीवन में खुश रहना है तो कभी अपने ऊपर दुःख को हावी होने मत दो। दुःख इस भारी पत्थर की तरह है जिसे हम जितना रखेंगे उतना ही हमें दर्द और कष्ट देता रहेगा।
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