एक कॉलोनी की दास्तान
लगभग दो वर्ष तो हो ही गये होंगे, दीक्षित जी को इस कॉलोनी में घर लिए हुए। गृह प्रवेश के समय उन्होंने कॉलोनी के सभी लोगों को बुलाया था। वहीं उनसे परिचय हुआ। केन्द्र सरकार की सेवा में उच्च पद से सेवानिवृत्ति उपरांत मिले फंड आदि से उन्होंने यह मकान लिया था। इकलौते बेटा-बहू इसी शहर में किसी कंपनी में कार्यरत थे। चार लोगों वाले उस घर में प्रायः सन्नाटा ही पसरा रहता। चूँकि हमारा घर उनके घर के बिलकुल सामने ही है तो आते-जाते वहां नजर पड़ ही जाती थी।
दीक्षित जी कभी कभार ही घर से बाहर निकलते थे। प्रायः अपने घर के लॉन में ही कुर्सी डाल कर पत्नी के साथ बैठकर आने-जाने वालों को निहारते रहते थे।
अफसरियत या स्वभावगत, जो भी कारण हो, उन्होंने कभी भी आगे रहकर बातचीत करने की पहल नहीं की। हमारे अभिवादन करने पर ही वे बोला करते थे। बेटा-बहू भी किसी से बात नहीं करते थे। छुट्टी वाले दिन वे चारों अपनी कार से घूमने निकल जाते। ज्ञात यह भी हुआ कि रूखा व्यक्तित्व होने के कारण अपने कार्यकाल के समय दीक्षित जी बहुत अलोकप्रिय अधिकारी रहे थे। एक शाम हम ऑफिस से लौटे ही थे कि दरवाजे पर दस्तक हुई। बेटे ने दरवाजा खोला तो दरवाजे पर बदहवास हालत में दीक्षित जी की पत्नी को खड़े पाया।
- इन्हें पता नहीं क्या हुआ, बैठे-बैठे बेहोश हो गये – वे उसी बदहवास हालत में जल्दी-जल्दी बोल रहीं थीं।
- आप परेशान न हों, हम चलकर देखते हैं – कहते हुए हमने अपने कपड़़े भी नहीं बदले और उनके साथ चले आयें। पीछे-पीछे हमारी श्रीमती भी आ गयीं।
लॉन की कुर्सी पर अचेतावस्था में पड़े दीक्षित जी को उनकी पत्नी के सहयोग से मने अंदर कमरे में दीवान पर लिटा दिया। चेहरे पर पानी के छींटे डालने पर वे थोड़ा चैतन्य हुए।
श्रीमती दीक्षित मोबाइल पर किसी से संपर्क करने की लगातार कोशिश कर रही थीं। तभी उनके मोबाइल पर ही कॉल आ गई। - कब से कॉल कर रही हूं, कहां हो तुम लोग? – कहते कहते वे रूआंसी हो गईं।
- जल्दी आओ – थोड़ी आश्वस्त होकर उन्होंने कॉल काट दी।
- बेटा-बहू आने ही वाले हैं – उनके चेहरे पर अब थोड़ा सुकून था।
कुछ ही समय में उनके बेटा-बहू आ गये। हमें देख वे चौंके तो श्रीमती दीक्षित ने हमारे आने का कारण उन्हें बता दिया। - ये डायबिटिक हैं। आज मंगलवार है तो व्रत में होने से शुगर लेबल कम हो गया होगा – कहते हुए बेटा ग्लूकोमीटर उठा लाया और उनकी शुगर जांचने लगा।
- कहा था न, शुगर कम हो गयी होगी – ग्लूकोमीटर दिखाते हुए वह बोला।
- कुछ खिला दो, मम्मी इन्हें – बेटे के लहजे में थोड़ी खीज थी।
- धन्यवाद अंकल – बेटे के चेहरे पर किंचित कृतज्ञता के भाव उभर आये।
- कोई बात नहीं, बेटा। इंसान ही इंसान के काम आता है – हमने ऐसे अवसर पर बोला जाने वाला ब्रहमवाक्य बोला और अपने घर लौटने लगे।
- अंकल, आप अपना नंबर दे दीजिये – कुछ सकुचाते हुए वह बोला।
- अच्छा आप अपना नंबर बोल दीजिये। मैं कॉल करता हूँ तो मेरा नंबर भी आपके पास आ जायेगा। आदित्य के नाम से सेव कर लीजिए – कहते हुए उसने अपनी जेब से मोबाइल निकाल लिया।
इस घटना को चार-पांच महीने हो गये। उस दिन के बाद इतना परिवर्तन हुआ था कि आमना-सामना होने पर आदित्य के चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाती और वह सिर हिलाकर अभिवादन भी करने लगा।
श्रीमती दीक्षित भी हमारी श्रीमती से अपने दरवाजे पर खड़े-खड़े थोड़ी बात कर लेतीं। दीक्षित जी भी अभिवादन का जवाब देने लगे थे। लेकिन कॉलोनी के बाकी लोगों के साथ उनका बर्ताव वैसा ही रहा।
फेसबुक पर आई आदित्य की फ्रैंड रिक्वेस्ट को हमने एक्सेप्ट करके उसकी प्रोफाइल देखी। उच्चशिक्षित आदित्य एक बड़ी अंतर्राष्ट्रीय कंपनी में उच्चे पद पर कार्यरत था। उसके फ्रैंडों और फोलोवरों की संख्या हजारों में थी। उसकी पोस्टों पर सैंकड़ों लाइक और कमेंट्स आते थे।
एक रात ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे के करीब आदित्य की कॉल आई। - सॉरी अंकल, इतनी रात को कॉल किया। दरअसल पापा एक्सपायर हो गये – कॉल रिसीव करते ही उधर से आदित्य की कुछ परेशान सी आवाज आई।
- हम अभी आ रहे हैं – बिस्तर से उठते हुए हमने कहा।
- अभी रहने दीजिए, अंकल। आप सुबह आ जाइये – आदित्य ने मना कर दिया।
- सुबह आकर क्रियाकर्म का सामान लाना होगा। यहां कॉलोनी के लोगों से भी कह देंगे – हमने थोड़ा जिम्मेवारी दर्शाते हुए कहा।
- कह दीजिए – उसने लगभग उदासीन ढंग से कहा।
- वैसे मैंने सोशल मीडिया पर मैसेज डाल दिया हैं। परिचित लोगों तक खबर पहुंच ही जायेगी – आत्मविश्वास से भरे लहजे से यह कहकर आदित्य ने कॉल डिसकनेक्ट कर दी।
अलसुबह उठकर हम पति-पत्नी चाय लेकर दीक्षित जी की घर पहंुच गये। उनके यहां पहुंचने वाले हम पहले व्यक्ति थे। हमने कॉलोनी के अन्य लोगों को भी यह खबर दे दी थी।
कुछ देर मे उनके दो-तीन रिश्तेदार भी आ गये। उन्होंने क्रियाकर्म की तैयारियां आरंभ कर दीं। - अंतिम यात्रा का क्या समय दिया है? – हमने दस बजा रही घड़ी को देखते हुए पूछा।
- नौ बजे का – आदित्य के स्वर में थोड़ी चिंता थी।
हमने मोबाइल में फेसबुक पर आदित्य का स्टेट्स देखा। उसने पिताजी के फोटो के साथ उनके निधन की पोस्ट डाली थी। इस पोस्ट पर तीन हजार आठ सौ से ज्यादा सेड वाली ईमोजी और नौ सौ से ज्यादा आर.आई.पी या सादर नमन, विनम्र श्रद्धांजलि के मैसेज आये थे। ये मिनट दर मिनट बढ़ रहे थे।
अंतिम यात्रा की तैयारी पूर्ण हो गई थी। ग्यारह बजे तक हम छह-सात लोगों के अलावा कोई नहीं आया था।
कॉलोनी के लोग अपने गेट तक आते और अंतिम यात्रा की कोई प्रक्रिया न देख वापस घरों में बैठ जाते। - कॉलोनी के लोगों को बुला लें – आदित्य के चेहरे पर फैल रही निराशा को देख हमने आदित्य से पूछा।
- जी – रूआंसे हो चुके आदित्य के मुंह से बस इतना ही निकल सका
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