मैं केवल तुम्हारे लिए गा रही हु
शिगिद पार की नील झंकार बन कर
मैं सतरंग सरगम लिए आ रही हु
मैं केवल तुम्हारे लिए गा रही हु
सुनो मीत मेरे के मैं गीत गाला
तुम्हारे लिए हु मैं स्वर का उजाला
मैं लोह बन के जल जल जिए जा रही हु
मैं केवल तुम्हारे लिए गा रही हु
मैं उषा के मन की मधुर साध पहली
मैं संदेया के नैनो में सुधि हो सुनहली
सुगम कर अगम को मैं दोहरा रही हु
मैं केवल तुम्हारे लिए गा रही हु
मैं स्वरताल लेह हु लवलीन सरिता,
मयांचीन अनजाने कवी की हु कविता
जो तूम हो वो मैं हु ये बतला रही हु,
मैं केवल तुम्हारे लिए गा रही हु…………
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