एक बार एक व्यक्ति और उसका बेटा दोनों अपने घर की छत पर पतंग उड़ा रहे थे। पतंग बहुत ही ऊंची उड़ रही थी, वो बादलों को छू रही थी। तब उसका बेटा उस व्यक्ति से कहता है कि पापा ये पतंग इस डोर से बंधी हुई है, जिस कारण और ऊंची नहीं जा रही है। इस डोर को तोड़ देना चाहिए।
बेटे की ये बात सुनकर उसका पिता उसके कहने पर वो डोर तोड़ देता है। उसका बेटा बहुत खुश होता है। वह पतंग टूट जाने से बहुत ऊंचाई पर पहुंच जाती है। लेकिन फिर कुछ समय बाद वह कहीं दूर जाकर खुद ही नीचे गिर जाती है।
ये देख उस व्यक्ति का बेटा उदास हो जाता है। फिर वह व्यक्ति उसे कहता है कि अक्सर हमें लगता है कि हम जिस ऊंचाइयों पर है उस ऊंचाई से और भी ऊपर जाने से कुछ चीजें हमें रोक रही है। जैसे हमारा अनुशासन, रिश्ते, माता-पिता और परिवार। इसकी वजह से हमें लगता है कि हम अपने जीवन में इस कारण ही सफ़ल नहीं हो रहे हैं। इन सब से हमें आजाद हो जाना चाहिए।
जैसा कि पतंग अपनी डोर से बंधे हुए रहती है और उस डोर की मदद से वह कई ऊंचाइयों को छू लेती है। उसी तरह हम भी अपने परिवार और रिश्तेदारों से बंधे हुए है। यदि हम इस धागे से जुड़े हुए रहेंगे तो कई ऊंचाइयों को छू लेंगे। लेकिन यदि हम इस धागे तो तोड़ देंगे तो ठीक इसी पतंग की तरह कुछ समय तक ही सफ़लता से उड़ पाएंगे। अंत में नीचे गिरकर ही रहेंगे।
ये पतंग जब तक नई ऊंचाइयों को हासिल करेगी तब तक वह अपनी डोर से बंधी हुई है। लेकिन जब पतंग अपनी डोर से मुक्त हो जाती है तो वह कुछ समय में ही नीचे गिर जाती है। उसी प्रकार हमें भी अपने जीवन में रिश्तों की डोर से बंधे हुए रहना चाहिए। जिससे हम अपने जीवन में नई ऊंचाईयां हमेशा हासिल करते रहे।
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