अगर तुम में चोरी की, आदत न होती ,तो ब्रज में यूँ मोहन, बगावत न होती ,, जो घर-घर में माखन, चुराया न होता ,तो हर दिन तुम्हारी, शिकायत न होती,जो माखन की मटकी, लुटाई न होती ,यूँ घर-घर में चर्चा, कन्हाई न होती ,अगर तुम में चोरी की……. भला कौन कहता, तुम्हें चोर छलिया,बिगाड़ी किसी की, अमानत न होती …
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