औरत को आईने में यूँ उलझा दिया गया,बखान करके हुस्न का, बहला दिया गया.ना हक दिया ज़मीन का, न घर कहीं दिया,गृहस्वामिनी के नाम का, रुतबा दिया गया.छूती रही जब पाँव, परमेश्वर पति को कह,फिर कैसे इनको घर की, गृहलक्ष्मी बना दिया.चलती रहे चक्की और जलता रहे चूल्हा,बस इसलिए औरत को, अन्नपूर्णा बना दिया.न बराबर का हक मिले, न चूँ …
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