रामकृष्ण अपने को अपने युवा शिष्यों के बराबर मानते थे । वह उनके बंधु सखा थे, उनके साथ सहज आत्मीयता से बात करते थे, किसी गुरुता के साथ नहीं । मानो इन बढ़ते हुए मानव पौधों के और सूर्य के प्रकाश के बीच में आकर वह इनके विकास में बाधक होना नहीं चाहते थे । दूसरों के व्यक्तित्व के प्रति …
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