द्वारिका में रखा सुदामा ने, पहला कदम,उसी पल हो गयी, आँखे कान्हा की नम, कैसे दौड़े कन्हैया कुछ कहा नहीं जाये ,बिना मिले मेरे शाम से अब रहा नहीं जाये ,कान्हो को देख सुदामा, भूल गए गम , अपने हाथो से कान्हा छप्पन भोग खिलाये,सब रनिया सेवा में , मिलके चवर हिलाये,सेवा मै जितनी करू आज, उतनी है काम, भोला …
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