पूछो मेरे दिल से यह पैगाम लिखता हूँ, गुजरी बाते तमाम लिखता हूँ दीवानी हो जाती वो कलम, हे गुरुवार जिस कलम से तेरा नाम लिखता हूँ जब से गुरु दर्श मिला, मनवा मेरा खिला खिला मेरी तुमसे डोर जुड़ गयी रे मेरी तो पतंग उड़ गयी रे फांसले मिटा दो आज सारे, होगये गुरूजी हम तुम्हारे मनका का पंछी …
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