मन चंगा तो कठौती में गंगा’ भक्त रैदास का रहन-सहन गृहस्थ जीवन में रहने के बाद भी संतों जैसा ही था। पेशा था, जूते-चप्पल बनाना और उनकी मरम्मत करना। एक बार कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा-स्नान पर्व के समय बड़ी संख्या में लोग गंगाघाट की ओर जा रहे थे। लेकिन रैदास की तो दुनिया ही अलग थी। वह अपने काम में …
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