जयति जगद्गुरु गुरुवर की, गावो मिलि आरती रसिकवर की। गुरुपद-नख-मणि-चन्द्रिका प्रकाश, जाके उर बसे ताके मोह तम नाश। जाके माथ नाथ तव हाथ कर वास, ताते होय माया मोह सब ही निरास। पावे गति मति रति राधावर की, गावो मिलि आरती रसिकवर की॥ अरे मन मूढ़! छाँडु नारी नर हाथ, गुरु बिनु ब्रह्मा श्यामहूँ न देंगे साथ। कोमल कृपालु बड़े …
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श्रीकृष्णोपदिष्ट कर्मयोग का स्वरूप
वेद आदि सतशास्त्रों में मनुष्यों के नि:श्रेयस के लिये उनके अंत:करण की योग्यता का विचार करके प्रवृत्तिधर्म और निवृत्तिधर्म का उपदेश किया गया है । कर्मयोग को निष्काम – कर्मयोग भी कहते हैं । कर्तापन के अभिमान को और कर्मफल की इच्छा को त्यागकर कर्तव्यबुद्धि से अपने वर्णाश्रम के धर्मों का श्रद्धा और प्रीतिसहित सावधानी के साथ पालन करना निष्काम …
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