दे दर्शन गुरु मेरे रुहां पुकार दियां दे दर्शन गुरु मेरे.संगता पुकार दिया | संगता दर्शन करने नु आइया, प्रेम तेरे ने मस्त बनाइया, दिल विच लगिया आशा, तेरे दीदार दियां, दे दर्शन गुरु मेरे रुहां पुकार दियां | धन धन सतगुरु तेरी करनी, मैं पापी नु ला लो चरणी, देखो ना तकफिरां मैं गुनहगार दियां, दे दर्शन गुरु मेरे …
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चक्रिक भील
ब्राह्मण, श्रत्रिय, वैश्य, शूद्र और जो अन्य अन्त्यज लोग हैं, वे भी हरिभक्तिद्वारा भगवान की शपृरण होने से कृतार्थ हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है । यदि ब्राह्मण भी भगवान के विमुख हो तो उसे भी चाण्डाल से अधिक समझना चाहिए और यदि चाण्डाल भी भगवान का भक्त हो तो उसे भी ब्राह्मण से अधिक समझना चाहिए । द्वापर …
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