जगन्नाथाष्टकं पुन्यं यः पठेत् प्रयतः शुचिः ,सर्वपाप विशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति , कदाचित् कालिन्दी तट विपिन सङ्गीत तरलो,मुदाभीरी नारी वदन कमला स्वाद मधुपः,रमा शम्भु ब्रह्मामरपति गणेशार्चित पदो,जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे, भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे,दुकूलं नेत्रान्ते सहचर-कटाक्षं विदधते ,सदा श्रीमद्-वृन्दावन-वसति-लीला-परिचयो,जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे , महाम्भोधेस्तीरे कनक रुचिरे नील शिखरे,वसन् प्रासादान्तः सहज बलभद्रेण बलिना ,सुभद्रा मध्यस्थः …
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