एक समय की बात है, एक गाँव के मंदिर में एक हाथी रहता था। वह प्रतिदिन संध्या के समय, नदी में स्नान करने जाया करता था। नदी में पानी से थोड़ी देर खेलता और फिर स्नान कर मंदिर वापस आ जाता था।
लौटते समय वह एक दर्जी की दुकान पर रुकता था। दर्जी उसे प्यार से केला खिलाया करता था। यह उसकी नियमित दिनचर्या थी।
एक दिन दर्जी किसी काम से शहर गया हुआ था। दुकान पर दर्जी का बेटा बैठा था। हाथी आया और उसने केले के लिए अपनी सूँढ़ उसकी ओर बढ़ाई।
बेटे को शरारत सूझी। उसने हाथी की सूंड में सूई चुभो दी। हाथी दर्द से तिलमिलाकर चुपचाप वापस चला गया।
अगले दिन हाथी फिर नदी पर नहाने गया। लौटते समय दर्जी की दुकान पर रुका और केले के लिए सूँढ़ बढ़ाया। इस बार
भी लड़के ने उसे सूई चुभो दी।
क्रुद्ध हाथी ने अपनी सूँढ़ में भरा हुआ कीचड़ का फव्वारा दर्जी के बेटे पर डाल दिया। उसी समय दर्जी वापस आ गया । सच्चाई जानकर दर्जी ने अपने पुत्र को डाँटा,
“यह हाथी हमारा मित्र है, उससे क्षमा माँगो…” और फिर दर्जी ने हाथी को प्यार से अपने हाथों से केले खिलाए। हाथी वापस चला गया।
शिक्षा : दया अपने आप में ही एक गुण है।
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