दिल्ली आते हुए बस की बराबर वाली सीट पर एक माता जी बैठी थीं। लगातार उनका फोन बज रहा था और वो पंजाबी में बात कर रही थीं। चीनी मिल की रहने वाली थीं। क्योंकि पंजाबी ज़ुबान अच्छे से समझ आती है तो इतना समझ आ गया दूसरी तरफ उनका बेटा था जिसके पास वो दिल्ली जा रही थीं। जैसे जैसे दिल्ली करीब आया उनकी बैचेनी बढ़ने लगी।
गाजियाबाद आते आते वो थोड़ा इसलिए परेशान हो गईं क्योंकि उनको जाना था कश्मीरी गेट और बस का आखिरी स्टॉपेज था आनंद विहार। यह बड़ी आम सी बात है कि दिल्ली की भीड़ से हर कोई घबराता है ख़ासकर बुजुर्ग को ज्यादा उलझन होती है।
आख़िर में मैंने उनसे पूछ ही लिया कि आपको कहां जाना है। उन्होंने कहा कि उनको कश्मीरी गेट जाना है वहां उनका बेटा उन्हें लेने आएगा। मैंने बोला आप परेशान ना हों। मैं आपको आनंद विहार ही उतार दूंगा और आप अपने बेटे को फोन पर बोल दो कि वो उधर ही लेने आ जाए। खैर, उन्होंने अपने बेटे को बोल दिया। बेटे ने उनसे कहा होगा कि लाइव लोकेशन भेज दें तो वो फोन कटने के बाद उसे बहुत गौर से घूरती रहीं।
खैर फोन लेकर मैंने लोकेशन भी उनके बेटे के नंबर पर भेज दी। आनंद विहार पहुंचे तो मैंने उनके बैग वगेरह लेकर उतर गया और एक फुटपाथ पर उन्हें ले जाकर खड़ा हो गया। आंटी ने सर पर हाथ रखा, पंजाबी ज़ुबान में खूब दुआएं दी।
बोलीं, बेटा तूने कित्थे जाना? चला जा, मैंने बोला हां मुझे जाना है आगे। मन हुआ कि आगे बढ़ जाऊं, लेकिन दिल नहीं माना। सुबह तड़के 4 बज रहे थे लगा बुजुर्ग हैं। सामान ज्यादा है, अकेले छोड़ गया तो रास्ते भर कश्मकश रहेगी कि बेटा आ गया होगा, ले गया होगा। बेटे के आने तक वहीं रुकने का फैसला किया।
चूंकि लाइव लोकेशन लगा रखी थी। करीब 20 मिनट बाद एक सफेद रंग की अल्टो वहीं आकर रूकी। एक सिख नौजवान गाड़ी से उतरा उसने आर्मी ड्रेस पहनी हुई थी। उतरते ही मुझे देखा और बोला अम्मार भाई क्या हाल हैं यह कहते ही गले लग गया।
आंटी बोली, तू जान दा एहनु? बोला यह फ्रीडम टीवी वाला है। फिर बोला भूल गया तू मुझे। मैंने अपनी याददाशत के घोड़े दौड़ा दिए। इससे पहले मैं याद करता। बोला अरे भाई मैं कुलदीप, एसएम स्कूल वाला।
कुलदीप मेरे साथ शायद दसवीं तक पढ़ा। और मैंने दसवीं 2009 में की थी। और अब यह मुलाकात 14 साल बाद हुई। चूंकि सिख था तो दाढ़ी और पगड़ी रखी तो पहचानना थोड़ा मुश्किल था शुरुआत में। मैंने पूछा तू यहां कहां है। तो कुलदीप ने बताया वो इंडियन आर्मी में है। इस वक्त वो राष्ट्रपति भवन में तैनात है। यह सुनकर खुशी और बढ़ गई।
जाते जाते थैंक्यू कहने लगा। मैंने बोला भाई तेरी मां मेरी मां नहीं है क्या?
ऐसे ही अनगिनत लोग मेरे साथ जुड़ गए हैं। मैं जहां जहां सफर पर गया लोगों से ऐसे ही राब्ते जुड़ते चले गए। बड़ी बात यह है कि आज भी कायम हैं रिश्ते। सबक यही है कि मदद करने का जज़्बा हो तो रास्ते ऐसे बनते हैं कि इंसान गुमान नहीं करता। आप जो दे रहे हैं। वो ही आपके पास लौटकर आएगा।
नेक नियत से बस चलते रहें। चालबाजी, चालाकी, बिना किसी लालच के मदद करते रहेंगे तो आपको वो मिलेगा जो आप गुमान भी नहीं कर सकते।
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