दोस्तो दो साल पहले की बात है मैने एक अखबार में एक लेख पढ़ा हुआ था। आप इसे ध्यान से पढ़िए, क्योंकि इसका एक – एक शब्द सच है। तो चलिए आपके साथ एक मां और उसके बच्चे की सच्ची कहानी शेयर करते हैं।
एक बार एक भारी भक्कम शरीर वाली महिला एक ट्रेन में सफर कर रही थी। देर रात के समय वह बाथरूम जाने के लिए उठी। जब वह बाथरूम कर रही थी तो ट्रेन बहुत तेज गति से दौड़ रही थी तो अचानक उसके गर्भाशय से उसका बच्चा फिसल कर नीचे रेलवे ट्रैक पर गिर गया।
ट्रेन बहुत तेज गति से दौड़ रही थी , लेकिन इस महिला दौड़ कर दरवाजे तक गई और उसे खोला और बाहर कूद गई। ट्रेन चलती रही और वह महिला लगभग आधा किलो मीटर तक वापिस दौड़ती गई। और उसने रेलवे ट्रैक पर पड़ा हुआ अपना बच्चा उठाया।
बाद में अखबार वालों ने इस बात की पुष्टि की की उस समय तक रेल कि पटरिया बहुत गर्म थी। इसी दौरान कुछ यात्रियों ने चेन खींच के ट्रेन रुकवा दी और उस महिला की तलाश में वहा पर दौड़ पड़े। कुछ प्रत्यक्ष दर्शियो के अनुसार महिला ने अपने कांपते हुए नवजात शिशु को अपनी छाती से लगा रखा था। लेकिन उसका शिशु जीवित था! दोनो बिलकुल सही सलामत थे!
दोस्तो यह कहानी हमे संक्षेप में आशा और विश्वास का संदेह देती है। उस समय इस महिला ने हालात की परवाह न करते हुए उस महिला ने स्पष्ट मन से असंभव लक्ष्य के बारे में सोचा। और उसने सही या गलत की परवाह नही की, किंतु या परन्तु जैसे शब्दो के बारे में भी नही सोचा और बिना किसी शक की गुंजाइश के ट्रेन से कूद गई।
क्योंकि उसका विश्वास पक्का था, और यकीनन एक मां में अपने शिशु को बचाने की भावना थी, उसके द्वारा ब्रम्हांड को भेजे गए संकेत इतने शक्तिशाली थे की ब्रम्हांड ने भी बिना एक क्षण गवाए कहा की तुम्हारी इच्छा पूरी हुई। इससे असंभव काम संभव में बदल गया। इसीलिए कहते हैं ना अगर लगन सच्ची हो तो रास्ते खुद ब खुद बन जाते हैं।
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