Saturday , 11 February 2017
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अजमेर शरीफ दरगाह

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Ajmer Sharif Dargah Story

अजमेर शरीफ दरगाह राजस्थान के अजमेर शहर में स्थित है। यह एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थान है। अजमेर शरीफ के प्रति सभी धर्म के लोगों के मन में श्रद्धाभाव है। माना जाता है कि इसमें ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह की कब्र स्थित है। इसे गरीब नवाज के नाम से भी जाना जाता है। अजमेर शरीफ की दरगाह से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित है।

अजमेर शरीफ दरगाह से जुड़ी एक कथा (Story of Ajmer Sharif)
एक कथा के अनुसार ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती का जन्म वर्ष 1141 में ख़ुरासान प्रांत में हुआ था। जब मुईनुद्दीन केवल 11 वर्ष का था, तब उसके पिता की मृत्यु हो गई। इसके बाद उसके पास अपना जीवन निर्वाह करने के लिए केवल एक जमीन का टुकड़ा था।

एक दिन मुईनुद्दीन के यहां देवरुप में हज़रत इब्राहिम कंदोजी आएं। मुईनुद्दीन ने उनकी खूब सेवा की जिससे प्रसन्न होकर इब्राहिम ने प्रेम भाव से उनके सिर पर हाथ फेरा। इसके बाद ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती अपना घर त्याग कर एक वृक्ष से नीचे समाधि लेने बैठ गए।

जिस वृक्ष के नीचे ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती बैठे थे, उसके नीचे से कुछ सिपाहियों ने उन्हें यह कहकर उठा दिया कि “यहां राजा के ऊंट बैठते हैं”। यह सुनकर वह बिना कुछ कहे वहां से उठकर चले गए। उनके स्थान पर जब ऊंट बैठें तो वह फिर उठ नहीं पाएं। इसके बाद सैनिकों ने मुईनुद्दीन चिश्ती से माफी मांगी।

इसके बाद राजा ने एक तलाब के किनारे ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती का निवास स्थान बना दिया, जहां बैठकर वह अल्लाह से हर वक्त लोगों के लिए खुशियां तथा अपने लिए दुख-दर्द और मेहनत की दुआ मांगते रहते थे।

ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती अजमेर में 

कथा के अनुसार कई तीर्थ यात्रा पैदल करते हुए ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती अजमेर पहुंचे। अजमेर में पहुंचने के बाद उन्होंने उसे अपना निवास स्थान बना लिया तथा लोगों को प्यार और सद्भावना का पाठ पढ़ाया।

माना जाता है कि अपने अंत समय में ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया और एक दिन नमाज अदा करते हुए उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद उनके चाहने वालों ने वहां उनका मक़बरा बनवा दिया।

अजमेर शरीफ दरगाह का विशेषता 
मान्यता है कि अजमेर शरीफ दरगाह जाकर लोगों के मन को सुकून मिलता है तथा उनके सारे दुख दूर हो जाते हैं। मुगल काल में बादशाह अकबर को भी इनकी ही दुआ से पुत्र की प्राप्ति हुई थी, तथा बादशाह ने आगरा से अजमेर तक पैदल यात्रा करके उनके दरगाह पर चादर चढ़ाया था।

अजमेर शरीफ की देग 
अजमेर शरीफ में दो विशाल देग (खाना पकाने के बर्तन) हैं। यह देग बादशाह अकबर और जहांगीर ने भेंट किए थे। हर वर्ष हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्ला अलैह की मजार पर उर्स के दौरान इन दो देगो में खाना बनता है जो गरीबों में बांट दिया जाता है।


 

Ajamer shareeph daragaah raajasthaan ke ajamer shahar mein sthit hai. yah ek prasiddh dhaarmik sthaan hai. ajamer shareeph ke prati sabhee dharm ke logon ke man mein shraddhaabhaav hai. maana jaata hai ki isamen khvaaja moeenuddeen chishtee rahamatulla alaih kee kabr sthit hai. ise gareeb navaaj ke naam se bhee jaana jaata hai. ajamer shareeph kee daragaah se judee kaee kathaen prachalit hai.

ajamer shareeph daragaah se judee ek katha (ajamer shareeph kee kahaanee)
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ek din mueenuddeen ke yahaan devarup mein hazarat ibraahim kandojee aaen. mueenuddeen ne unakee khoob seva kee jisase prasann hokar ibraahim ne prem bhaav se unake sir par haath phera. isake baad khvaaja mueenuddeen chishtee apana ghar tyaag kar ek vrksh se neeche samaadhi lene baith gae.

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isake baad raaja ne ek talaab ke kinaare khvaaja mueenuddeen chishtee ka nivaas sthaan bana diya, jahaan baithakar vah allaah se har vakt logon ke lie khushiyaan tatha apane lie dukh-dard aur mehanat kee dua maangate rahate the.

khvaaja mueenuddeen chishtee ajamer mein

katha ke anusaar kaee teerth yaatra paidal karate hue khvaaja mueenuddeen chishtee ajamer pahunche. ajamer mein pahunchane ke baad unhonne use apana nivaas sthaan bana liya tatha logon ko pyaar aur

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