Wednesday , 12 July 2017
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हंसी हर जगह मौजूद है बस हंसने के बहाने ढूंढिए

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हंसी हर जगह मौजूद है बस हंसने के बहाने ढूंढिए

                                               हंसी हर जगह मौजूद है बस हंसने के बहाने ढूंढिए

कन्नड़ लेखक एच. योगनसिंहम् ने महर्षि कर्वे ( भारतरत्न 1958 धोंडो केशव कर्वे) की आत्मकथा ‘लुकिंग-बैक’ का कन्नड़ में अनुवाद किया था। उनसे सिर्फ पत्र व्यवहार द्वारा ही परिचय था पर महर्षि कर्वे से वह कभी मिले नहीं थे।

एक बार जब वे पूना गए तो वे महर्षि कर्वे से भेंट करना चाहते थे। उनकी यह मनोकामना पूरी हुई। उनकी भेंट कर्वे से उनके आवास पर हुई। औपचारिक बातों के बाद महर्षि कर्वे ने उनसे घरेलू सवाल पूछा, ‘आपके कितने बच्चे हैं?’

लेखक की तरफ से जवाब मिला, ‘आठ’ महर्षि ने कहा, ‘तो इसका मतलब यह हुआ कि राष्ट्र को आपकी देन मुझसे दोगुनी है।’ योगनरसिंहम चकरा गए। महर्षि की अपेक्षा उनकी राष्ट्र सेवा दुगनी? इस तरह उन्होंने प्रश्नवाचक दृष्टि में महर्षि की तरफ देखा।

उन्होंने महर्षि की तरफ देखा। मुस्कुराते कर्वे बोले, ‘आठ…चार के दोगुने आठ’ हुए कि नहीं और महर्षि हंसने लगे। महर्षि कर्वे आखिर में थे गणित के प्राध्यापक। उनका गणित आगंतुक की समझ में आ गया और वे अपनी हंसी न रोक पाए।

Hindi to English

Kannada writer H. Yogansinham had translated the autobiography ‘Looking-Back’ in Kannada of Maharishi Karve (Bharat Ratna, 1958 Dhondo Keshav Karve) in Kannada. They were introduced only by letter behavior but they were never met by Maharishi Karve.

Once he went to Poona, he wanted to meet Maharshi Karve. His wish was fulfilled. His meeting with Karve was at his residence. After formal talks, Maharishi Karve asked him a domestic question, ‘How many children do you have?’

The answer came from the writer, ‘Eight’ Maharishi said, ‘So this means that your donation to the nation is double than me.’ Yoganarsinham was astonished. Do they serve their nation twice than Maharshi? In this way he looked towards Maharishi in a questionable sight.

They looked towards Maharishi. Smiling Karve said, ‘eight … four of the four times eight’ did not happen and Maharishi started laughing. Maharishi Karve was finally a professor of mathematics. His math was understood by the visitor and he could not stop his laugh.

 

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