Monday , 11 September 2017
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नागाओं ने अलग देश की मांग की तो सांसत में आ गया था पूरा देश

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Anecdote is of fifty years. Then the people of the Naga community were in a group of tribals and lived in the eastern part of the Himalayas near the Indo-Burma border.

भारत के सामने एक देश के रूप में जो चुनौतियां हैं, उनमें आतंकवाद सबसे ज्यादा हिंसक और खूंखार है। आजादी के बाद से ही कश्मीर पर कब्जे की लड़ाई में पाकिस्तान इस कार्ड को छद्म ढंग से खेलकर भारत को परेशान करता रहा है।

मगर एक समय ऐसा भी था जब आतंकवाद कहीं पीछे छूट गया था और नईदिल्ली का पूरा ध्यान नागा आंदोलनकारियों ने खींच लिया था।

ये वो समय था जब भारत सरकार कश्मीर घाटी पर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी थी, जबकि उसके सामने भारत-बर्मा (म्यांमार) सीमा के नागा आंदोलन ने हिमालय के दूसरे छोर से ज्यादा बड़ी चुनौती पेश की थी।

किस्सा पचास के दशक का है। तब नागा समुदाय के लोग कई आदिवासियों के समूह में थे और भारत-बर्मा सीमा के पास हिमालय के पूर्वी इलाके में रहते थे।

ये अपने पहाड़ी ठिकानों में शेष भारत की राजनीतिक, सामाजिक व अन्य तरह की उठापटक से दूर निश्चिंत होकर रहते थे।

मगर सन् 1946 में जब देश के बंटवारे की पटकथा लिखी जा रही थी, नागाओं के प्रतिनिधित्व या उनके इलाकों को लगभग भुला दिया गया।

इस उपेक्षा से नाराज नागा आदिवासी नेताओं ने राष्ट्रवादी आंदोलन का बीजारोपण कर दिया। आंदोलन तेजी से आगे बढ़ा और उपेक्षित नागाओं ने अपने लिए अलग देश की मांग रखना शुरू कर दिया।

भारतीय राजनेता तब देश के अन्य इलाकों में उलझे हुए थे और नागा आंदोलन तेजी से विकराल होता जा रहा था। एक समय तो ऐसा भी आया जब कश्मीर, जूनागढ़, हैदराबाद सहित तमाम रियासतों के विवाद नागा आंदोलन के आगे फीके पड़ने लगे। जबर्दस्त हिंसा ने नागाओं की पहचाने से जुड़े इस वैचारिक आंदोलन की ओर पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। इससे भारत सरकार के कान खड़े हो गए।

आखिरकार आजादी के बाद प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू को सब काम छोड़ तत्काल इस ओर ध्यान देना पड़ा। तब जाकर नागाओं की अलग देश की मांग थोड़ी ठंडी पड़ी और वे भारत में रहने को राजी हुए।

Hindi to English

Among the challenges facing India as a country, terrorism is most violent and dreadful. Since independence, Pakistan has been harassing India by playing this card in an impersonation battle against Kashmir.

But there was a time when terrorism had gone back and New Delhi’s full attention was drawn by Naga agitators.

This was the time when the Indian government was engaged in strengthening its hold on the Kashmir Valley, while against it the Naga movement of Indo-Burma (Myanmar) border presented a greater challenge than the other side of the Himalayas.

Anecdote is of fifty years. Then the people of the Naga community were in a group of tribals and lived in the eastern part of the Himalayas near the Indo-Burma border.

They lived far away from the political, social and other kind of rest of India in their hilly areas.

But in 1946 when the country’s distribution scrip was being written, the representations of Nagas or their areas were almost forgotten.

Angered by this neglect, Naga tribal leaders planted the nationalist movement. The movement progressed rapidly and neglected Nagas started taking the demand for a separate country for themselves.

Indian politicians were then embroiled in other areas of the country and the Naga movement was becoming increasingly distraught. There was a time when the disputes between all the states, including Kashmir, Junagadh and Hyderabad, began to fade away from the Naga movement. Extreme violence took the attention of the whole world towards this ideological movement associated with identifying Nagas. This led to the ears of the Government of India.

After all, after Independence, the first Prime Minister, Nehru, had to pay attention to it immediately after leaving all the work. Then the demand for a different country of Nagas was cold and they agreed to stay in India.

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