Tuesday , 11 July 2017
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उज्जैन नगर का, ‘मैं अकेला भिक्षुक’

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उज्जैन नगर का, 'मैं अकेला भिक्षुक'

उज्जैन नगर का, ‘मैं अकेला भिक्षुक’

उज्जैन के राजकुमार शातवाहन की बुरी संगति को छुड़ाने के लिए आश्रम में उनके गुरु शिवदास ने उन्हें बहुत पीटा। शिवदास अपने प्रयास में सफल रहे और शातवाहन ने कुसंगति छोड़ दी।

कुछ समय बाद जब शातवाहन राजा बने तब तक गुरु शिवदास की स्थिति अत्यंत दयनीय हो चुकी थी। एक दिन वे भिक्षा मांगते हुए राजा के पास जा पहुंचे। गुरु शिवदास को याचक के रूप में आया देख राजा बोले , आपने मुझे बहुत पीटा है, इसलिए आपकी दशा पर मुझे बिल्कुल भी तरस नहीं आता।

इस बात को सुनकर गुरु शिवदास बोले, लेकिन मुझे तो यह देख कर बड़ा आनंद मिला कि तुम्हें ठीक करने से तुम्हारे राज्य में आज सभी लोग सुख और संपन्न हैं। अकेला एक मैं ही भीख मांगने वाला हूं।

In English

To redeem the evil of Ujjain’s Prince Shatavahan, his Guru Shivdas beat him a lot in the ashram Shivdas succeeded in his endeavor and Shatavahan left the anomaly.

After some time when Shatwahan became king, the condition of Guru Shivadas was extremely pathetic. One day he went to the king asking for alms. When Guru Shivdas came in the form of yachak, the king said, you have beaten me a lot, so I do not have any compassion for your condition.

Upon listening to this, Guru Shivdas said, but I found great joy in seeing that all the people in your state are happy and prosperous today. I am the only one I beg.

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